Wednesday, 21 September 2016

बंगाल का स्वर्ग - दार्जिलिंग / Darjeeling: The Paradise of Bengal




 

गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होने वाली थीं। लेकिन छुट्टियों में खुली प्रकृति के बीच जाकर समय बिताने की योजना अब तक नहीं बन पाई थी। इतने कम समय में सफर के टिकट और रहने की जगह का प्रबंध हो पाना भी मुश्किल था। इच्छा में बड़ी ताकत होती है। इच्छा की ताकत से ही नेट पर जी तोड़ खोजबीन के बाद दो दिनों में हमने बंगाल के स्वर्ग दार्जिलिंग की वादियों में जाने की जरूरी बुकिंग कर डाली। ऋश्यप, कोलाखाम और चारकोल के पहाड़ी सफर में हमें चाय के बागों के दृश्यों की कमी बहुत महसूस हुई थी। इसलिए इस सफर के पहले पड़ाव के तौर पर हमने सिंगथम टी एस्टेटको चुना।

हिल कार्ट रोड से होते हुए सिंगमारी के नार्थ प्वाइंट से सिंगथम टी रिसोर्ट 1500 फुट नीचे था। एक तो तीखी ढाल, उस पर पहले लगभग दो किलोमीटर रास्ते के खुरदुरेपन ने पहले तो भयभीत किया लेकिन आगे चलकर जब चाय के बाग के दृश्य दिखने लगे तब आँखें इतनी व्यस्त हो गईं कि मन को भयभीत होने की फुरसत ही नहीं मिली। एक ही कद में छटे चाय के पौधे, राह में चाय की पत्तियाँ तोड़ती औरतें और पेड़ों का हरा चादर ओढ़कर खड़े पहाड़ का दृश्य मन में रिसता जा रहा था। इन्हीं राहों से गुजरते हुए हम सिंगथम रिसोर्ट पहुँचे।

सिंगथम टी एस्टेट दार्जिलिंग का सबसे पुराना टी एस्टेट है। सन् 1842 में जर्मन व्यक्ति स्टेन्थेल द्वारा बनाया गया बंगला ही आज सिंगथम टी एस्टेट का रिसोर्ट है। इस बंगले के प्रवेश द्वार से ही दोनों ओर कतार में लगे रंग-बिरंगे फूलों, बंगले के ठीक सामने हरे लॉन पर रखी सफेद कुर्सियों और सफेद चादर से ढ़के मेज़ और उस पर लगी छतरियों के रंगीन दृश्य ने ध्यान खींचा। इस जगह को चुनने की सबसे अहम वजह थी चाय के पौधों का मनोरम दृश्य और नीरवता। रिसोर्ट के कमरे में टंगी तांबे के रंग के फ्रेम में भूरे और सुनहरे रंग की पेंटिंग, फायर प्लेस से लेकर ड्रेसिंग टेबिल तक गहरे मेहगनी रंग के काठ पर सुनहरे रंग से की गई नक्काशी, ऊँचे छत से नीचे लटकते लैंप शेड, कुछ एंटिक शो पीस विक्टोरिया युग में होने का अहसास दिला रहे थे। कमरे की सजावट से लेकर उसमें सोच समझ कर अंधेरे को बरकरार रखने की कोशिश तक इंग्लैण्ड के रॉयल वातावरण को बचाए रखने की कोशिश दिख रही थी। कमरे की बड़ी-बड़ी कांच की खिड़कियों पर जब लताओं और गुल्मों के फैले साम्राज्य को हवा और रोशनी को रोकते हुए पाया तब इस जगह को चुनने का फैसला गलत लगने लगा। लेकिन रिसोर्ट की सजावट में विदेशीपन होने के बावजूद प्राकृतिक सौंदर्य और प्रकृति की जीवंतता ने अफसोस के हालात पैदा होने नहीं दिए। रिसोर्ट के मैनेजर सेनगुप्ता बाबू, टी एस्टेट के मैनेजर गौतम बाबू और देखरेख करने वाले युवक आदित्य की मिलनसारता ने वातावरण में अपनापन घोल दिया। रिसोर्ट के भीतर और बाहर के वातावरण में अजीब सा विरोधाभास था। रिसोर्ट के बरामदे से दिखता पहाड़ का दृश्य और पहाड़ के माथे पर सिरमौर की तरह कंचन जंघा का अचानक फूट निकलना मानो प्रकृति का नीरवता के साथ हमें दिया गया खुला आमंत्रण था। प्रकृति के इस दावत ने मन को छू लिया। शाम को रिसोर्ट में बॉन फायरकी व्यवस्था थी। यहीं यहाँ के मैनेजर सेनगुप्ता बाबू से खुलकर बातचीत करने का मौका मिला। इस बंगले में साल भर में आने वाले यात्रियों में नब्बे फीसदी विदेशी होते हैं। इनकी मेजबानी से अधिक लाभ कमाने की संभावना यहाँ के वातावरण में विदेशीपन भरती जा रही है।

पहाड़ी इलाके में ट्रेकिंग की खास चाह के कारण अगले दिन सुबह हम चाय के बाग और यहाँ के लोगों की संस्कृति से रूबरू होने निकल पड़े। ट्रेकिंग करते हुए हम मैनेजर साहब के बंगले तक जा पहुँचे। फिर उन्हीं से रिसोर्ट तक पहुँचाने का श़ॉर्ट कट रास्ता जानकर वापस लौटे। राह में ही यह जानकारियाँ मिली कि यहाँ कुल 850 के लगभग लोग काम करते हैं। चाय के बाग में काम करने वाली औरतें यहाँ जमीन खरीद सकती हैं। यहाँ के परिवार मूलत: मातृसत्तात्मक हैं। फौज से सेवानिवृत्त कई अफसर, पत्नी के चाय के बाग से संपर्क होने के कारण यहाँ पत्नी के नाम से जमीन खरीदकर रह रहे हैं।

सिंगमारी के मोड़ पर विशाल सेंट जोसफ्स स्कूल था। इस विशाल और भव्य स्कूल में कई फिल्मों की शूटिंग भी हुई है। स्कूल के उल्टे तरफ रोप वे था। रोप वे से टकबर तक पहुँचना एक अविस्मरणीय घटना थी। चाय के हरे खेत और कहीं जंगल के ऊपर से होते हुए गुजरना और खामोश जगहों से गुजरते हुए पक्षियों का कलरव सुनना, एक अनोखा मंजर था। टकबर पहुँचकर एक छोटे से स्टॉल का मालिक नौजवान रोबिन के व्यवहार ने हमें मुग्ध किया। उसकी अपने दुकान से दूर दिखती चाय की फैक्टरी, चाय के बाग से होकर गुजरने वाले सर्पीले रास्तों को दिखाने की चाहत में मानो यात्रियों को इस जगह के रंग को महसूस कराने की अपील थी। आप उसके सामान के खरीददार बने या न बने इस निर्णय का प्रभाव उसके व्यवहार पर पड़ता हुआ नहीं दिखा।

टॉय ट्रेन दार्जिलिंग की एक खूबसूरत विरासत है इसकी टिकट न मिल पाने के कारण इस पर चढ़ने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हो पाया। हमें अब वापस रिसोर्ट लौटना था। हम सिंगमारी से रिसोर्ट चाय के दृश्य का जायजा लेते हुए पैदल लौटना चाहते थे। लेकिन बारिश की वजह से इस योजना को रद्द करना पड़ा। होटल पहुँचकर दरवाजे के सामने बैठकर हम उस पार के पहाड़ पर सितारों की तरह जलते असंख्य घरों की रोशनी को निहारने लगे वहीं मेरी मुलाकात यू. एस. से आई जेसिका से हुई। जेसिका डब्लू. एच. ओ. की ओर से प्रोजेक्ट पर काम करने अपने वैज्ञानिक पति के साथ भारत आई थी। उसे भारत बेहद पसंद था और यहाँ की हवाओं में भारतीयता की गंध महसूस करना चाहती थी। लेकिन सिंगथम रिसोर्ट में उस गंध को पाना मुश्किल था। हम कुछ ही पल में बहुत अच्छे दोस्त बन गए। भारतीय संस्कृति के प्रति जेसिका के गहरे आकर्षण ने मुझे भी उसकी ओर खींचा।

सिंगथम के बाद हमारा अगला पड़ाव था दार्जिलिंग का हैपी वैली होम स्टे। नेपाली परिवार की मेज़बानी में रहने का आनन्द हम पहले भी हासिल कर चुके थे। एक परिवार को जानना साथ ही उनकी संस्कृति को महसूस करने का मौका होटल में रहकर मिलना मुश्किल था। हैपी वैली में सुव्रत तमांग के खुशमिज़ाज परिवार के साथ बिताए पल हमारे लिए यादगार हैं।

दार्जिलिंग में कदम रखते ही बारिश ने हमारा दामन पकड़ा। प्रकृति के इस अनचाहे तोहफे ने हमें इस बात का ऐहसास दिलाया कि अनचाहे हालात में भी अगर धैर्य के साथ राहें खोजी जाएं तो अनुभवों की जोली में दुर्लभ रंग भरे जा सकते हैं। दार्जिलिंग की वादियों में मेघों का छाकर करीब के दृश्य को भी धुंधला कर देना और फिर कभी हल्की-सी बरसात के साथ या फिर यूँ ही धुंधलके का धीरे-धीरे छट जाना और फिर सूरज की किरणों का हल्के-से स्पर्श करना इस मौसम में प्रकृति का खेल था। मैंने महसूस किया कि यह खेल केवल बरसात में देखा जा सकता है।

बादलों के साथ आँखमिचौनी खेलते हुए तब तक सूरज हल्का-सा निकल आया था। हम दार्जिलिंग चौरस्ते से होते हुए महाकाल शिव मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। कहा जाता है कि बरसों पहले इस मंदिर के पुजारी दोर्जे नामक महात्मा हुआ करते थे। जो यहाँ शिव की आराधना करते थे। इस दोर्जे बाबा और उनके आराध्य शिव लिंग के नाम पर ही इस शहर का नाम दार्जिलिंग पड़ा। यह क ऐसा अनोखा मंदिर है जहाँ बौद्ध और हिंदू दोनों मतावलम्बी अपने-अपने ढ़ंग से सदियों से शिव की पूजा करते हैं। शिव मंदिर के थोड़ा नीचे एक गुफा है कहा जाता है कि यहाँ महात्मा दोर्जे और फिर हातिम ताई रहा करते थे। गुफा का मुँह बहुत संकरा है उसके भीतर प्रवेश करना निश्चित रूप से दुष्कर कार्य है।

बरसात के रुकने के इंतजार के बाद जापानी मंदिर और पीस पेगोडा देखने के लिए निकलने का पल हाजिर था। दूर से ही जापानी मंदिर से नगाड़े की आवाज आ रही थी। प्रार्थना गृह में प्रवेश करते ही बौद्ध पुजारी ने बैठने का इशारा किया और एक हथपंखे जैसी वस्तु के साथ एक छोटी-सी लाठी देकर इसे सामने के श्यामपट पर लिखे लोटस सूत्र के मंत्र से ताल मिलाते हुए बजाने का इशारा किया। वह पल प्रार्थना का पल था। और उस वक्त वहाँ आने वालों को भी प्रार्थना में शामिल होने का खुला आमंत्रण था। यह जापानी मंदिर जपान के प्रमुख संपन्न फूजी गुरुजी ने बहुत पहले बनवाया था। गुरुजी ने छठी शताब्दी तक जपान में प्रचलित तमाम बौद्ध सिद्धान्तों का अनुसरण किया था। 1917 में उन्होंने बौद्ध धर्म का प्रचार आरंभ किया। उन्होंने चीन और जापान को युद्ध की मानसिकता के दुष्परिणामों के प्रति आगाह भी किया था। वे बौद्ध धर्म की जड़ों को बुद्ध की जन्मभूमि में आकर मजबूत करना चाहते थे। वे सन् 1933 में गांधी जी मिले और जब द्वितीय विश्व युद्ध में जापान में परमाणु बम फेंका गया तब वे लगातार भूखे रहकर प्रार्थना में लीन रहे। सन् 1946 में उन्होंने बुद्ध के शाश्वत जीवन से संबंधित त्याग का संदेश और लोटस सूत्रके जरिए लोगों को शान्ति और अहिंसा का संदेश देने के लिए शान्ति का प्रतीक पीस पैगोडाबनाने का निर्णय लिया। और फिर उनके अनुयायियों ने भुवनेश्वर, लद्दाख, दार्जिलिंग, वर्धा, वैशाली, नई दिल्ली, जापान, श्रीलंका, नेपाल, यूरोप, संयुक्त राष्ट्र में पीस पैगोडा बनवाया। शान्ति का प्रतीक श्वेत धवल पीस पैगोडा और उसके बीच बुद्ध की सुनहरी मूर्ति दूर से ही नजर आ जाती है। ऊँचाई पर स्थित बुद्ध की मूर्ति के पीछे की ओर बुद्ध के बाल्यकाल और निर्वाण से जुड़ी तमाम कथाएँ नक्काशीदार चित्रों में वर्णित हैं।

दार्जिलिंग जिले का सबसे ऊँचा स्टेशन घूम हमारा अगला मुकाम था। यहाँ अक्सर मेघों का साम्राज्य छाया रहता है। यहाँ दूर से दिखने वाले पाईन के वृक्षों का सौंदर्य मनोरम है। घूम में हम चौरान्वे साल पुराने बौद्ध विहार में पहुँचे। बुद्ध की सुनहरी मूर्ति प्रवेश द्वार से ही दिख रही थी। मंत्रोच्चारण से भीतर के परिवेश में अजीब-सी गंभीरता थी। भीतर के दीवारों पर बुद्ध के जीवन से जुड़ी कथाओं पर आधारित चित्रकारी शोभा पा रही थी। यह जगह घूम मोनास्ट्री के नाम से प्रसिद्ध है।

अब हम बताशिया लूप की ओर बढ़ रहे थे। बताशिया का अर्थ है हवादार। यह दार्जिलिंग के टाईगर हिल का उभरा हुआ भाग है। यहाँ छोटी गेज़ की रेललाइन घूम और दार्जिलिंग शहर के बीच दोहरे फंदे की तरह बिछी है। यहाँ युद्ध में शहीद होने वाले जवानों की स्मृति में एक अंडाकार संगमरमर के चबूतरे पर एक गोरखा सिपाही की तांबे की मूर्ति है उसके साथ ही 30 फुट ऊँची त्रिकोणाकार ग्रेनाइट के स्मृति स्तंभ पर सिपाही के सम्मान में वचन लिखे हुए हैं।

ऑरेंज वैलीटी एस्टेट से होते हुए रॉक गार्डन की ओर जाने का रास्ता है। चाय के बाग से गुजरते हुए हमने बादल के चादर के बागों पर छाने और धीरे-धीरे हट जाने का नजारा बहुत ऊँचाई से देखा। ये वह मुकाम था जब हम बादलों की ऊँचाई पर थे। मेघ हमें छूते हुए ऊपर की ओर उड़ रहे थे। इस मुकाम से कई फीट नीचे था रॉक गार्डन। चट्टानों से टकराती और उस पर से बहते हुए पहाड़ी झरने का पानी रॉक गार्डनसे होते हुए नीचे आ रहा था। इस पहाड़ी झरने को केन्द्र में रखकर चट्टानों को काटकर पहाड़ के ऊपर तक जाने का रास्ता था। लोहे की रेलिंग, काठ के बेंच और मूर्तियों से रास्ता सजा था। बैठने के लिए जगह-जगह छावनियाँ थीं जहाँ से पहाड़ी झरने के नीचे तक बह जाने का नजारा देखा जा सकता था। चट्टानों से बहते हुए झरने की कल-कल आवाज में एक प्राकृतिक पहाड़ी छंद था।

रॉक गार्डनके रास्ते से होकर गंगा माया पार्क जाने का रास्ता है। गंगा माया सन् 1986-87 में हुए भूमि आंदोलन के लिए शहीद हुई कालिंपोंग की एक वृद्धा महिला थी। उसकी स्मृति में ही यह पार्क बना था। यहाँ भी चट्टानों से होते हुए पहाड़ी झरने का बहना और इस झरने को केन्द्र में रखकर जगह-जगह बैठने की जगह की व्यवस्था आकर्षणीय थी। वापस लौटते हुए ड्राइवर ने बताया कि कुछ साल पहले रॉक गार्डन  में भू-स्खलन के कारण भयानक हादसा हुआ था। ऊपर के पत्थरों के नीचे खिसक आने के कारण पुराना रॉक गार्डन नष्ट हो गया था। फिर से इसे बनवाया गया। खूबसूरती बिखेरती इन जगहों को देखकर यह अंदाज लगाना मुश्किल हो जाता है कि बरसात में यही जगह भू-स्खलन की संभावनाओं के कारण मौत की घाटी भी बन सकती है।

दार्जिलिंग सफर का एक दिन सिर्फ आस-पास की जगहों को टहलते हुए देखने और मन पसंद जगहों पर रुक कर दूर तक का नजारा देखते रहने के लिए निर्धारित था। सुबह-सुबह सैर पर निकलने के साथ ही इस दिन की शुरुआत हुई। ऊँची चढ़ाई चढ़कर हम नाइटिंगल पार्क पहुँचे। यह पार्क सुबह की सैर करने वालों के लिए आदर्श जगह है। इस पार्क में सुबह कई छोटे बच्चों को जूडो कराटे और व्यायाम का प्रशिक्षण दिया जा रहा था। पहाड़ी इलाकों में जीवन जीने के लिए जिस कठिन परिश्रम और कौशल की जरूरत होती है। उसका अंदाजा ट्रेकिंग के जरिए लगाया जा सकता है। हमारे रहने क जगह के ठीक सामने हैपी वैली टी एस्टेट था। चाय के बाग का मनोरम दृश्य देखते हुए आगे बढ़ते-बढ़ते हम कहीं कहीं थोड़ी देर के लिए रुककर नजारा देख रहे थे। इसी तरह आगे बढ़ते हुए हम पद्मजा नायडू के नाम पर बने चिड़ियाघर पहुँचे। चिड़ियाघर की योजना और यहाँ रखे जाने वाले वन्य प्राणियों के देख-रेख की व्यवस्था काबिले तारीफ है। चिड़ियाघर के साथ संलग्न हिमालयन पर्वतारोहण संस्था एक और विशेष आकर्षण था। खासकर पर्वतारोहण का संग्रहालय काबिले तारीफ है। इसका अवलोकन व्यक्ति को पर्वतारोहियों के जुनून का एहसास दिलाता है। साथ ही उनके द्वारा प्रयुक्त सामान और उनकी उपलब्धियों की जीवंत छवि को मन में बैठा देता है। यह संग्रहालय हिमालय की टोपोग्राफीका भी ऐहसास दिलाता है।

दार्जिलिंग में जहाँ कई नए आकर्षक पर्यटन स्थल दिखाई दिये वहीं लॉयड बोटैनिकल गार्डन का क्षय भी दिखा। कभी रंग-बिरंगे फूलों से सजा होने वाला यह स्थल अब जंगल-सा दिखता था। सिर्फ एक संकरा सर्पीला रास्ता नीचे तक जाता हुए दिखाई दे रहा था। इसे देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल था कि कभी यहाँ एक जगह बैठकर दूर तक देखा जा सकता था और छटे हुए घास और पौधे, रंग-बिरंगे फूल एक खूबसूरत नजारा तैयार करते थे। बोटैनिकल गार्डन से बाहर निकलने की चढ़ाई चढ़ते हुए दार्जिलिंग में लगभग दस-साल पहले आ चुके एक पर्यटक की आँखें यहाँ पेड़ों पर लटके संतरों के नजारे की कमी महसूस कर रही थी। भले ही यह संतरों का मौसम नहीं था लेकिन उनका कहना था कि आजकल मौसम में भी ऐसे दृश्य न दिखने का कारण है मोबाइल टावर और प्रदूषण। इसके कारण प्रकृति के कुछ खूबसूरत नजारे आज केवल अतीत की स्मृतियाँ बनकर रह गए हैं। बावजूद इसके बंगाल का स्वर्ग दार्जिलिंग आज भी पर्यटकों के एक बहुत बड़े वर्ग को खींचने की ताकत रखता है। इस सफर की खूबसूरत यादें आज भी मेरे जेहन में बसी हुई हैं।

चित्त के आईने में चित्तरंजन / Chiitaranjan in the Mirror of Heart





गर्मियों की छुट्टियों से पहले मिले फुर्सत के दिन बोनस में मिले पलों की तरह थे। होली के रंग में डूबे मौसम में हमने चित्तरंजन शहर में समय बिताने का फैसला किया। पाँच दिनों का अवकाश और पहाड़ी या सागर के किनारे बसे शहरों को न चुनकर हमने चित्तरंजन को ही क्यों चुना? साथियों का यह सवाल वाजिब था। दरअसल शांतनु का बचपन इस शहर में बीता था। विवाह के बाद से आज तक चित्तरंजन में बिताए पलों की बातें उसकी यादों में सुनहरे अक्षरों में चमकते थे। इतना ही नहीं संयोग से कोई चित्तरंजन का अंजान इंसान भी मिल जाता तो इस शहर से जुड़ी खुशनुमा यादें उनके बीच सेतु बन जाती थीं। भले ही इंटरनेट में यह शहर  रेल इंजन बनाने के कारखाने के लिए परिचित दिखा, लेकिन इस शहर की हवाओं में कुछ तो ऐसी बात थी कि यहाँ की बातें यहाँ वक्त गुजारने वाले लोगों की खुशनुमा यादों का हिस्सा बन जाती हैं। इस शहर की कशिश, उसकी संस्कृति और प्राकृतिक अनोखेपन की बातें मैंने सुनी थीं और अब उसे महसूस करना चाहती थी। तभी अवकाश मिलते ही होली के दिन हम चित्तरंजन के लिए रवाना हुए। शांतनु में अपने बचपन की खोई यादों को ताज़ा करने की चाहत थी तो मुझमे इस शहर की कशिश को महसूस करने की चाहत। आठ वर्ष की बिटिया राशि तो पढ़ाई से पाँच दिनों की आज़ादी के खयाल से ही खुश थी। सन 1950 से पहले यहाँ दुर्गादीहि गाँव हुआ करता था। यहाँ के आदिवासियों को हटाकर भाप इंजिन बनाने वाली पहली फैक्ट्री चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स और इसमें कार्यरत लोगों के लिए चित्तरंजन शहर बना। स्वतन्त्रता सेनानी चित्तरंजन दास के नाम पर बना यह शहर दीवार से घिरा है। यह दीवार इस शहर की सीमारेखा निर्धारित करती है। इस शहर में अस्पताल, विद्यालय, महाविद्यालय, बाज़ार, सिनेमा घर, लाइब्रेरी और मनोरंजन के तमाम साधन हासिल हैं। यहाँ नदी, पहाड़, बांध, बाग-बागीचे एक साथ देखे जा सकते हैं। रूखेपन से मुक्त इस योजनाबद्ध शहर की बातें ही मुझमें इसे देखने की चाहत को बढ़ा चुकी थीं।

कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ़्टी श्री पी0के0 आचार्या के सौजन्य से रेलवे अफसर क्लब की मेज़बानी में हम चित्तरंजन स्टेशन से इस शहर की ओर रवाना हुये। चित्तरंजन के प्रवेश द्वार पर बना भाप इंजन का मॉडल ही इस बात का एहसास दिला रहा था कि द्वार के उस पार एक खूबसूरत सजीला शहर बसता है। शहर के चौड़े काले चिकने रास्तों के साथ ही यहाँ की हरीतिमा से निखरे प्राकृतिक सौन्दर्य ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा। अफसर क्लब से होती हुई हमारी गाड़ी चित्तरंजन भवन कैम्पस पर आकार रुकी। कैम्पस का चौड़ा पक्का दोनों ओर सफ़ेद बार्डर खिंचा रास्ता, एक ही आकार और कद में छटे देवदारू के पेड़, विशाल हरा लॉन उसके चारों ओर गेरू से रंगे ईंटों के बार्डर के बीच लाल मिट्टी का रास्ता और ईंटों के बगल में एक पंक्ति में लगे गेंदे के फूल से लदे पौधे प्रकृति को निरखने और खामोशी को महसूस करने का निमंत्रण दे रहे थे।

दोनों ओर गेरू और चूने से रंगे तनों वाले पेड़ों के बीच से गुजरे रास्तों पर सुबह की सैर का आनंद ही कुछ और था। ओवल ग्राउंड, देशबंधु स्टेडियम का चौक पार करके हम हिल टॉप की ओर बढ़ रहे थे। सामने बसंती इंस्टीट्यूट था। जहाँ सिनेमाघर और लाइब्रेरी एक साथ थे। यहाँ होने वाले विज्ञान की प्रदर्शनियों की बातें मैंने सुनी थी। इंस्टीट्यूट के बगल में ही एक मैदान में बड़े-बड़े यूकेलिप्टस के पेड़ दिखे। यह ईस्ट मार्केट का इलाका था। जहाँ का रास्ता कुछ हद तक खुरदरा था। इस रास्ते से हिल टॉप की ओर बढ़ते हुये फूलों से सजी हुई एक जगह दिखी। यह होर्टिकल्चर सुपरिंटेंडेंट का कार्यालय था। शांतनु की स्मृति में आज भी इस जगह पर कभी आयोजित होने वाली फूल और सब्जियों की प्रदर्शनियों के बिम्ब ताज़ा थे। उन प्रदर्शनियों से बागवानी को प्रेरित करने की संस्कृति को बढ़ावा मिलता था। अपने आँगन को पौधों से खूबसूरती से सजाने वालों को पुरस्कृत करने की रीत लोगों के सौंदर्यबोध को बढ़ावा देती थी। आज उस संस्कृति के क्षय की खबर ने शांतनू को चोट पहुंचाई। लेकिन मेरे मन के कोरे कागज में चित्तरंजन के वर्तमान की जो छवि बन रही थी उसमें यह शहर प्राकृतिक वैभव से नवाजा हुआ ही दिख रहा था। भले ही अतीत में यह शहर और भी खूबसूरत रहा हो लेकिन आज भी यहाँ जो है वह आकर्षक है। इसी के साथ यहाँ के प्राकृतिक वैभव को बरकरार रखने वाली संस्कृति को बचाने का सवाल भी मेरे मन में उमड़ रहा था। ताकि यहाँ जो कुछ भी बचा है वह महफूज रह सके।

हिल टॉप का सौन्दर्य अनोखा है। यहाँ से पूरा चित्तरंजन शहर दिखाई देता है। सफ़ेद और लाल रंग से रंगे छोटे – बड़े पत्थर इस जगह की शोभा बढ़ा रहे थे। पहाड़ी के ठीक ऊपर बनी छावनी में अजीब सी शांति थी। हल्की ठंडी हवा उस पर हमारी ध्वनि का हम तक लौट कर आना एक खूबसूरत अहसास था। छावनी की छत पर चित्तरंजन शहर के उन जगहों के नाम लिखे थे जो उस बिन्दु पर खड़े होकर दिखाई देते थे। हरे रंग के आधार पर खड़ा चाँदी के रंग का झण्डा फहराने का खंभा यह स्पष्ट करता था कि राष्ट्रीय पर्वों में यहाँ सम्मिलित होने की एक संस्कृति जिंदा है।

सुपरिकल्पित शहर चित्तरंजन में कुल पाँच बांध है। हिल टॉप पर बने पानी के रिजर्वर तक वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से होते हुये पानी पहुंचता है। यहीं से पूरे चित्तरंजन शहर में पानी पहुंचाया जाता है। इस व्यवस्था के साथ ही हर इलाके में एक पार्क, एक डिस्पेन्सरी और एक प्राइमरी स्कूल की व्यवस्था इस शहर के सुपरिकल्पित होने का परिचय दे रही थी। प्राकृतिक शोभा से समृद्ध इस शहर में गांधी खमार नाम से प्रसिद्ध एक जगह हुआ करती थी। जहाँ कुछ लोग गांधी दर्शन पर अमल करते हुए चरखे से सूत कातने और खेती करके आत्मनिर्भर जीवन जीने की राह पर चलते थे। प्राकृतिक शोभा के बीच सहज जीवन जीने का यह प्रयास सराहनीय था। इस जगह पर आज राजराजेश्वरी का मंदिर निर्मित हो चुका था। समय के वार से गांधी जी की बताई राह की छाप भले ही इस जगह सिमट चुकी हो लेकिन गांधी की मूर्ति बीते हुए समय का प्रतीक बनकर आज भी खड़ी है।

विशाल मैदान के बीच स्थित चित्तरंजन का काली मंदिर यहाँ धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की आधारभूमि थी। शांतनु की स्मृति में बसा मंदिर आज विशाल और पहले से कहीं अधिक सुंदर आकार ले चुका था। लेकिन मंदिर के विशाल प्रांगण में नाटक या जात्रा (नाटक का एक रूप ) खेलने का रिवाज आज यहाँ की हवाओं से मिट चुका चुका था। इसी के समांतर रेलवे सुरक्षा बल द्वारा हाल ही में निर्मित शिव-पार्वती का अत्यंत आकर्षक मंदिर यहाँ की संस्कृति के नए साँचे में ढलने की सूचना दे रहा था।

चित्तरंजन के ऑफिस रोड पर बना बांध भी एक देखने लायक मंज़र था। बांध के दूसरी ओर भारत स्काउट एंड गाइड का ऑफिस और दूर तक फैला शूटिंग रेंज था। कर्नल सिंह पार्क के नाम से परिचित इस इलाके में आज इस पार्क के ध्वंसावशेष ही खड़े थे। जहाँ रख रखाव के अभाव में आज यह पार्क तकरीबन जंगली पौधों के आहोश में था वहीं चिल्ड्रेन्स पार्क और लोको पार्क यहाँ समय के साथ बने ऐसे दो खूबसूरत  स्थान थे जिन पर से आँख हटा पाना मुश्किल था। एक बड़े से खुले मुंह के आकार का चिल्ड्रेन्स पार्क का प्रवेश द्वार और घड़ियाल, मशरूम और अलग-अलग जानवरों के आकार में बनी बैठने की जगह और झूले बच्चे तो क्या बड़े – बूढों को भी खुशनुमा वक्त बिताने का निमंत्रण देते थे। लोको पार्क में रखा भाप का इंजिन और टोंय ट्रेन इस जगह के विशेष आकर्षण थे।
अजय नदी चित्तरंजन शहर की प्राकृतिक सुषमा में चार चंद लगाती है। नदी के इस पार चित्तरंजन है तो उस पार झारखंड। नदी में पानी बेहद कम होने के कारण बड़े–बड़े पत्थर बाहर निकाल आयें थे। पत्थरों के बीच से अजय नदी पतली रेखा सी बह रही थी। नदी के इस रूप को देखकर यह अंदाज़ा लगा पाना मुश्किलथा कि कभी यही नदी अपने पानी के तेज़ बहाव से पुराने पुल को तोड़कर कई लोगों के प्राण ले चुकी थी। दरअसल बरसात में यह नदी उफनती हुई चलती है। लेकिन नदी के इस भरे-भरे इतराते रूप का अंदाज़ा इस मौसम में नहीं लगाया जा सकता था।
चित्तरंजन के इस सफर को कुछ खास लोगों ने और खास बना दिया। शांतनु के विद्यालय के साथी अभिरूप और प्रदीप्त से मिलकर उनमे छिपे समृद्ध कलाकारों को पहचानने का मौका मिला। चित्रकला के शिक्षक प्रदीप्त  योग्य चित्रकारों की एक नयी पीढ़ी तैयार करने के काम में जुटकर कुछ संथाली विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने के काबिल बनाने के काम में काफी आगे निकाल चुके थे। अभिरूप में दुर्गम जगहों पर पहुँचकर खींचे तस्वीरों को कलाकार की नज़रों से देखते हुए पेंटिंग इफेक्ट के जरिये दुर्लभ कलारूप को आकार देने का जुनून था। उस पर सफर में मिली साथी ऋतिका का होली पर निमंत्रण और उसके परिवार का अपनत्व भाव, होली में रंगों से स्वागत सरल और सहज सौन्दर्य का अहसास दिला रहा था।

अजय नदी का आकर्षण इतना दुर्निवार था कि हम अगले दिन सुबह भी सैर के लिए अजय नदी के किनारे गए। रास्ते में सुंदर पहाड़ी और शांतनु का प्राथमिक विद्यालय भी देखा। ये वे जगह थे जिनकी बातें मैंने सुनी थी। लेकिन फुर्सत से देखने का मौका आज मिल रहा था। रास्तों से गुजरते हुए ऐसे तमाम बंगले और क्वार्टर दिखे जो वहाँ रहने वालों की बागवानी के प्रति विशेष रुचि का अहसास दिला रहे थे।लेकिन ऐसे कई घर भी दिखे जहाँ सब्ज बागों और फूलों का साम्राज्य नहीं था। यह अंतर इस बात का अहसास दिला रहा था कि सचमुच इन्सानों के हाथ में जादू है। सुरुचि और खूबसूरत सजावट हमेशा पूंजी की मोहताज नहीं होती। आदमी साधारण चीजों से ही अपने घर आँगन को स्वर्ग सा बना सकता है।

अच्छे दोस्त बड़े किस्मत से मिलते हैं। दोस्तों के बीच बंधन को तिल-तिल कर तैयार करने में उस जगह की संस्कृति,जीवन शैली का बहुत बड़ा योगदान होता है। चित्तरंजन में बिताए दिनों की खुशनुमा यादें, हमारे आने की खबर सुनते ही शांतनु के दोस्तों को हमारे गेस्ट हाउस में खींच लाई। खासकर अभिरूप की आँखें चित्तरंजन को एक कलाकार और नवोन्मेषी  निगाहों से देखती थीं। चित्तरंजन के हर गली कूचों को हम देख सकें इसलिए उसका विशेष आग्रह था कि हम एकदम सुबह उसकी गाड़ी से ही यहाँ के जर्रे-जर्रे को घूमकर महसूस करें। जिन राहों से शांतनु विद्यार्थी जीवन में कभी साइकिल से जाया करते थे उन्हीं पसंदीदा और मसृण राहों से खुद ड्राइव करने का आनंद और रह-रह कर पुरानी यादों के उमड़ आने की खुशी उसकी आँखों से जाहिर हो रही थी। हम उस मुकाम तक गए जहाँ से एक संथाली गाँव शुरू होता था। जहाँ शांतनु अक्सर आया करते थे। लेकिन आज वहाँ गाँव नहीं पक्के मकान थे। वक्त के साथ आए इस बदलाव से संथाली गाँव देखने की हसरत उस वक्त पूरी न हो पाई।

संथाली गाँव देखने की हसरत मन में लगातार हिलोरें ले रही थी। अभिरूप चित्तरंजन से बाहर बहुत दूर निर्जन जगहों पर अक्सर तस्वीरें खींचने जाया करते थे। एक खूबसूरत क्षण को कैमरा बंद करने के लिए कई महीनों तक एक ही जगह पर जाकर इंतजार किया करते थे। छुट्टी के दिन को इसी तरह बिताने की उनकी आदत थी। उन्हें ऐसे संथाली गाँव का पता था जो अब भी शहरी छाप से मुक्त थे। फिर क्या था, उनके निर्देशन में हम बोडमा पहाड़ की ओर चल पड़े। पहाड़ी के करीब पत्थरों को एक विशेष रूप में रखा हुआ देखकर हम रुके। अभिरूप ने बताया कि ये पत्थर शुरू से ऐसे ही खड़े हैं। लगभग अट्ठाईस सालों से अभिरूप यहाँ लगातार आ रहें हैं। यहाँ महुए के पेड़ों की भरमार है। ताल के पेड़ के पत्ते एक दूसरे से घिसकर मर्मर की ध्वनि पैदा कर रहे थे।उस पर सामने खड़ा बोडमा पहाड़ और खूबसूरत लगता था। जो पहाड़ पहले लगभग वृक्षहीन था आज उसमें कई छोटे-छोटे वृक्षों को देखकर अभिरूप ने इस बदलाव की सूचना दी। वहाँ से हम संथाली गाँव चंद्रदीपा की ओर बढ़ रहे थे। दूर से दीवार पर चित्रकारी किए हुए मिट्टी के घर दिखे। दीवारों पर बने चित्र लोगों की सौन्दर्य चेतना का अहसास दिला रहे थे। संथालियों के घर की यह खासियत है कि प्रवेश द्वार के बाद ही ग्वाल घर होता है। फिर मुर्गी, सूअर, बकरियों का घर, आँगन में मिट्टी का बना चूल्हा और धान पर भाप देने के लिए बना मिट्टी का एक दूसरे किस्म का चूल्हा भी। सीतामणि मुरमु के घर घुसते ही भात के माड़ की सी गंध आयी। यह सूखे महुए के फूल से निकले फलों की गंध थी। किसमिस से दिखने वाले इन फलों को सुखाकर महुए का नशीला रस बनता है। हर साल जनवरी में संथाली अपने घर की फीकी हो गयी दीवारों के चित्रों में रंग भरते हैं। किसी के दीवार पर मोर बना था तो किसी के दीवार पर लाल और काली रेखाओं का डिजाइन।

अब हम चंद्रदीपा से लादना गाँव की ओर बढ़ रहे थे। इस गाँव के आखरी प्रांत में बराकर नदी खत्म होती है। यह माइथन का पिछला हिस्सा है। रास्ते में कीर्तन के लिए शामियाना लगाए जाने के कारण हमारी गाड़ी लादना नहीं पहुँच पाई। हम पहाड़ के ऐश्वर्य को चार चंद लगाती और उसके  कदमों को छूती नदी के किनारे बैठकर सूर्यास्त देखना चाहते थे। अभिरूप ने भी पहाड़ के दूसरी ओर से ऐसा ही दृश्य दिखाने की बात ठान ली और हम बोडमा पहाड़ को पीछे छोड़कर किलही पहाड़ की ओर बढ़ने लगे । उसी रास्ते से हम बराकार नदी के किनारे पहुंचे जो माइथन का एक और पिछला हिस्सा था। जहाँ बांध बनाकर नदी को रोक दिया गया था । यहाँ पहले गाँव हुआ करता था। गाँव को वहाँ से हटाकर ऊपर बसा दिया गया था। सूर्यास्त से लगभग एक घंटा पहले हम यहाँ पहुँच चुके थे। दूर खड़े पहाड़ और नदी के प्राकृतिक ऐश्वर्य के बीच हमने सूरज को लालिमा बिखेरते हुए डूबते देखा। वक्त के साथ नदी में सूरज का प्रतिबिंब लंबा होता जा रहा था। हम उस दृश्य को एकटक देख रहे थे। और अभिरूप संथाली बच्चों से लगातार बात करते हुए उनकी तस्वीरें खींच रहे थे। उनका विश्वास आजकल इस बात पर टिका हुआ था कि जिंदगी के छोटे-छोटे पलों की कहानी जीवन की लंबी कहानी से कहीं ज्यादा जीवंत होती है। इन पलों की कहानी को तस्वीरों के जरिये अभिव्यक्त किया जा सकता है। वह भी कुछ ही घंटों में खींची तस्वीरों से, किसी बात से पैदा हुई अनुभूति से चहरे पर उभर आई रेखाओं के जरिये। यह सिरीज़ फोटोग्राफी है। अभिरूप उन संथाली बच्चों के उन्हीं पलों को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे।

पाँच दिन नजाने कैसे बीत गए और चित्तरंजन से रवाना होने का समय हो गया। चित्तरंजन शहर से बाहर निकलते ही हिंदुस्तान केब्ल्स द्वारा बसाया गया वह शहर दिखा जो अब उजाड़ चुका था। टेलीफ़ोन के तार बनाने वाली यह कंपनी मोबाईल की संस्कृति के आने के साथ ही उजड़ने लगी थी। वक्त की तेज़ धार में बहकर हिंदुस्तान केब्ल्स का वह शहर आज उजाड़ बस्ती बन चुका था। शांतनु ने ड्राइवर से उस उजड़े शहर का चक्कर लगाते हुए जाने का आग्रह किया। उसकी आँखें आज उन क्वार्टरों का उजड़ा हुआ रूप देख रहीं थीं जिसे कभी उसने आबाद देखा था। जहाँ रहने वाले मित्रों के घर कभी उसका आना जाना था। कभी बेहद सजा हुआ जी0एम0 का बंगला आज जंगली पेड़ों के कब्जे में था। यह कंपनी बदलते वक्त के साथ खुद को नए साँचे में ढाल नहीं पाई थी। इसका परिणाम हमारी आँखों के सामने था।

पक्के रास्ते को छोड़कर नदी के बगल से गुजरने वाले कच्चे रास्ते से हमारी गाड़ी माइथन पहुंची। ड्राइवर का ही विशेष आग्रह था कि हम इस रास्ते के सौन्दर्य को महसूस करें। आसनसोल पहुँचते ही रेलवे अफसर श्री एच0 के0 मीणा की सहृदयता और स्वागत के अनोखे अंदाज़ ने इस सफर में हमें एक और खुशी का पल भेंट किया। चित्तरंजन से हम अपनी आँखें और मन को खुशियों से भरकर लौट रहे थे। यही खुशियाँ व्यस्त ज़िंदगी में मन को उपयुक्त रसद देतीं हैं।   
                                                            

                   
  

पहाड़ों की खामोशी में गुजरा वक्त / In The Serenity of Hills


प्रकाशित : प्रगतिशील वसुधा 97, जुलाई - सितम्बर अंक 



ऊंचे पहाड़ों के बीच मेघों की आँखमिचौनी के प्रति मेरा गहरा रुझान रहा है। तभी तो गर्मियों की छुट्टियों का ख्याल आते ही उत्तर बंगाल के ऋश्यप, कोलाखाम और चारकोल की खामोश वादियों में वक्त गुजरने की चाह मन में बरबस उठने लगी। छुट्टियाँ शुरू होने के पहले के अंतिम दो सप्ताह की व्यस्तताएं और भागदौड़ के पलों को हम पहाड़ी की खामोशी में डूबने के इंतज़ार में काट रहे थे।
सफर पर निकलने के दिन पास आ रहे थे। लेकिन इसी बीच नेपाल के खौफनाक भूकंप सफर के दिन गिनते मन को बेचैन कर गया। सफर को रद्द करने का पूरा दबाव रिशतेदारों की और से बना रहा। लेकिन मन को भी साल भर दौड़ने के लिए खुराक की जरूरत थी। हमने मन की बात सुनी और दार्जिलिंग मेल से न्यू जलपाईगुड़ी के लिए निश्चित दिन पर रवाना हुये।
सिलीगुड़ी में एक करीबी दोस्त के परिवार की आत्मीयतापूर्ण मेज़बानी ने सफर का खुशनुमा अगाज़ किया। उन्हे अलविदा कहकर हमारी जीप पहाड़ी रास्तों का सफर तय करने आगे बढ़ी। मैदान से हल्की ऊंचाई तय करते ही हवाओं की नमी ने अपनी कोमल छुअन से स्वागत किया। सर्पीली राहों पर हम आगे बढ़ रहे थे और दूसरी ओर गहराती खाई में चंचल तिस्ता नदी हाँफती उफनती हुई चल रही थी। कहीं चौड़ी तो कहीं पतली। पहाड़ों के चरणों में बहती तिस्ता मानो प्रकृति के एश्वर्य पर चार चाँद लगा रही हो। कलिमपोंग शहर से गुजरते हुए हम डेलो पहाड़ पहुँच चुके थे। यहाँ बादल धुएँ की तरह हमें छूते हुए गुज़र रहे थे। हम बादलों की ऊंचाई पर थे। डेलो पार्क का मेघमय सौन्दर्य हमारे अंदर रिस रहा था। डेलो में हिल टॉप पर बनी एक छावनी के बेंच पर बैठकर ऊंचाई से पतली रेखा सी दिखती तिस्ता नदी और  मेघों से कहीं ढके तो कहीं अधढके दूर स्थित पहाड़ों को हम निर्वाक देख रहे थे।
हमारा अगला मुकाम ऋश्यप काफी ऊंचाई पर था। इस गाँव से कंचनजंघा की श्वेत धवल श्रंखला दिखाई देती है। सुनहरी धूप में चमकती कंचनजंघा की बर्फ से ढकी चोटियों को देखने की हसरत पहले दिन आसमान में छाए बादलों के कारण पूरी नहीं हो पायी। रात को जमकर बरसात हो तो इस हसरत के पूरे होने की संभावनाएं थीं। बहरहाल लॉगहट के लहजे में बने कमरे की बड़ी बड़ी काँच की खिड़कियों से मैं लंबे समय तक मेघों के वादियों पर छाने और हट जाने का खेल देखती रही । इसी खेल को शायद महादेवी ने मेघों की आँखमिचौनी कहा है।
इस सफर में मैंने महसूस किया कि प्रकृति और मानव मन की गतिविधियों में गहरा साम्य है। दूर कहीं खाई से धीरे धीरे ऊपर फैल जाने वाले बादलों का आस पास के सभी नज़रों को ढक देना इंसान की दुनियादारी की चिंताओं का जीवन के खूबसूरत पलों को महसूस करने की ताकत को दबा देने के बराबर महसूस हो रहा था। मेघों के साम्राज्य को चीरकर कंचनजंघा की स्वर्णाभ चोटियाँ भला कैसे दिखे। बादल की चादर तो उस दिव्य ज्योति सी उज्ज्वल शिखर के न होने का भ्रम पैदा कर रहीं थीं।
दूर से कहीं पानी के बरसने की आवाज़ आ रही थी। दरअसल दूर की पहाड़ी पर छाए बादल अब बरसने लगे थे। और धीरे धीरे वादियों का नज़ारा भी साफ हो रहा था। आँसू मन के मैल धो देता है। बरसात ने भी आसमान के मैल को धो दिया था। रात भर की बरसात ने कंचनजंघा को  देखने का दरवाजा खोल दिया था। ऊंचे ऊंचे हरे पहाड़ों के पीछे गगनचुम्भी कंचनजंघा की चमकती श्वेत धवल चोटी पहाड़ों के माथे का मुकुट लग रहीं थीं। हँसती धूप के प्रसार को देखकर यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि हरियाली से भरे पहाड़ और स्वर्णाभ कंचनजंघा का यह नज़ारा आँखों के पहुँच की सीमा में होते हुए भी कल आँखों से ओझल था।
ऋश्यप से हम कोलाखाम का सफर शुरू कर चुके थे। करीब 60 राई परिवारों का यह गाँव कोलाखाम सिक्किम और भूटान के बहुत करीब है। ऋश्यप से लावा होकर कोलाखाम पहुँचने का रास्ता था। लावा में हम बौद्ध विहार देखने के लिए रुके। लावा बौद्ध विहार का शांतिपूर्ण वातावरण और नक्काशीदार रंगीन इमारतों में गहरा आकर्षण था। यहाँ करीब सौ विद्यार्थियों को बौद्ध सन्यासी के रूप में जीवन व्यतीत करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। विशाल प्रार्थना गृह, अध्ययन स्थल और विद्यार्थियों के निवास स्थल में शांति और गांभीर्यपूर्ण सौन्दर्य छाया हुआ था। इस शांत जगह से अब हम कोलाखाम के उस मुकाम की ओर बढ़ रहे थे जिसे साइलेंट वैली के नाम से जाना जाता है।
कोलाखाम में कदम रखते ही ऋश्यप की तुलना में इसकी निर्जनता के आधिक्य का अंदेशा लगते देर नहीं हुई । यहाँ के निवासी दीपक राई की मेज़बानी में एक नए किस्म के एहसास का सफर शुरू हुआ। इस जगह से एक साथ कई पहाड़ों का ढलान दिखना और दो कतारों में बटें पहाड़ों के बीच ऋषि नदी के बहने के दृश्य को वन में गूँजते पक्षियों की आवाजों के बीच निरखना एक स्वर्गीय अनुभव था। लेकिन सच का एक पहलू यह भी है कि कोलाखाम पहुँचते ही यह स्वर्गीय अनुभूति एकाएक ही नहीं हो पायी।
कोलाखाम पहुँचते ही यहाँ की निर्जनता ने मुझे सबसे पहले छुआ। इस निर्जनता से सबसे पहले एक अंजाना सा भय पैदा हुआ। किसी सुनसान जगह में एकाएक आ पहुँचने का भय। आस पास सिर्फ घने पेड़ और सुनसान पहाड़ी रास्ता। उस पर यह खबर कि यहाँ न कोई दवाखाना है और न ही कोई डॉक्टर। यहाँ तक कि इसके निकटतम शहर लावा में भी अस्पताल नहीं मिलता। निकटतम अस्पताल कलिमपोंग में है, जहाँ पहुँचने में यहाँ से तीन घंटे लगते हैं। एकाएक मन में कई सवाल उठने लगे। शहर से इस तरह कटे गाँव में शिक्षा, मनोरंजन, जीविकोपार्जन  के क्या साधन होंगे? डाक तथा बाज़ार की सुविधाएं हासिल करने के लिए निकतम शहर लावा तक दौड़ने की जहमत भी कितने लोग उठा पाते होंगे? कितना सूनापन भरा होगा यहाँ की ज़िंदगी मैं। निर्मल वर्मा की लाल टीन की छत उपन्यास में व्यक्त पहाड़ी निर्जनता और भय का ख्याल हो आया। इन्हीं ख्यालों से मन शाम तक बोझिल रहा।
रात को दूर के पहाड़ों में जुगनुओं की तरह रोशनी टिमटिमाने लगी थी। जो इस निर्जन में इन्सानों की मौजूदगी का संकेत दे रही थी। पूछने पर पता चला कि उस पहाड़ पर सिक्किम है। कोलाखाम में सिर्फ राई परिवार के लोग ही रहते हैं। अगले दिन सुबह यहाँ जिंदगी के खुशनुमा संकेत दिखने लगे। सबसे पहले नज़र पड़ी सीढ़ीदार खेतों पर। पहाड़ी ढलान पर बने सीढ़ीदार खेत यहाँ के लोगों के मेहनतकश होने का संकेत दे रहे थे। यहाँ के हर घर का एक महत्वपूर्ण अधव्यवसाय खेती है। इलाईची की खेती यहाँ इफरात में होती है। यहाँ के लोगों के लिए ऊंचाई से काफी नीचे तक चंद मिनटों में पहुँच जाना कोई बड़ी बात नहीं हैं। यहाँ के बच्चे से लेकर बूढ़े तक बड़ी आसानी से ऊंचाई से नीचे तक का सफर शॉर्टकट रास्तों से बड़ी जल्दी तय कर लेते हैं। पर्यटकों के रहने और सैर करने के प्रबंध के जरिये अच्छी आमदनी हो जाती है। दूषण मुक्त वातावरण में डॉक्टर और दवाखाने की जरूरत बहुत कम पड़ती है।
सुबह ट्रेकिंग करते हुये ढलानों पर बने कई बेहद खूबसूरत घर दिखे। उनमें से एक घर का खास जिक्र करना जरूरी है। इस घर के सामने नर्म घास गलीचे की तरह बिछी थी। खाई की तरफ एक श्रंखला में पाइन वृक्ष लगे थे। और घर के सामने रंग बिरंगे फूलों के पौधे लगे थे। एक ओर यह सौन्दर्य और दूसरी और नीचे बहती ऋषि नदी की कल कल आवाज़। इस घर के मालिक और कारीगर एक कृषक विकास राई थे। उनके सौन्दर्य बोध और समृद्ध सोच ने हमें काफी प्रभावित किया।
पहाड़ की ढलान पर बने घर के सामने एक छोटी सी जगह पर तीन बच्चों के क्रिकेट खेलने के नज़ारे ने भी यहाँ के जीवन के एक और चरित्र को खोला। बच्चों की उम्र पाँच से छह साल की होगी। पहाड़ की ढलानों पर अक्सर गेंद लुढ़क कर नीचे चली जाती थी। इस समस्या से निपटने के लिए उन्होने अपनी गेंद कागज से बनाई थी। एक गेंद के खोने पर नई गेंद बनाने के लिए कागज का इंतज़ाम भी था। प्रकृति के साथ समझौता करके ही इन बच्चों ने मनोरंजन की राह खोज ली थी। मैंने महसूस किया कि मैदानी जीवन के चश्मे से कोलखाम के पहाड़ी जीवन के चरित्र का आकलन करना संभव नहीं था।
कल मन में उभर आए तमाम दुखपूर्ण सवाल आज मन से गायब हो चुके थे। सुबह सैर पर निकलकर मिले लोगों से पता चला कि हाई स्कूल भले ही लावा में हो, पर यहाँ के लोग प्राइमरी स्कूल तक कोलाखाम में बच्चे को पढ़ाने के बाद उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए पेडून, लावा या कलिमपोंग भेज देते हैं। लावा में हफ्ते में एक बार लगने वाले हाट से लोग अपने जरूरत का सामान हफ्ते भर के लिए खरीद लेते हैं। पर्यटकों के आने की सूचनाएँ बुकिंग एजेंट से फोन पर ही मिल जाती हैं। इसलिए उनके लिए प्रबंध करने में भी दिक्कत नहीं होती। खुला प्राकृतिक परिवेश और बाज़ार से दूरी तब मुझे इनके लिए वरदान सी जान पड़ने लगी। शहरों में शिक्षा हासिल कर रही इनकी अगली पीढ़ी इस वरदान को महफूज़ रखने में कितनी कामयाब होगी यह बात मन में उठी तो जरूर थी लेकिन ऊंचे पहाड़ों के पीछे बादलों के हट जाने की वजह से उभर आई सफ़ेद अन्नपूर्णा की चोटी ने इस बात पर सोचने की फुर्सत ही नहीं दी।
घने जंगल के बीच से गुजरते रास्तों से हम कोलाखाम को छोड़कर एक और खूबसूरत मुकाम चारकोल की ओर बढ़ रहे थे। चारकोल लोलेगाँव के ऊपरी भाग पर स्थित एक छोटा सा गाँव है। यहाँ घने जंगल नहीं बल्कि चारों ओर सीढ़ीदार खेती का नज़ारा दिखता है। खूबसूरत फूलों के पौधे यहाँ की मिट्टी में आसानी से उग जाते हैं। इस गाँव के लोगों का सौंदर्यबोध भी देखने लायक है। ये पौधे चारकोल के रास्ते से गुजरने के एहसास में रंग भर रहे थे। यहाँ भी हमें ट्रेकिंग के दौरान गाँव के लोगों से घुलने मिलने का मौका मिला। चारकोल के पहाड़ के शिखर पर मेंढक के आकार का एक पत्थर है। लोगों का कहना है कि यह पत्थर बहुत दूर से दिखता है। यहाँ तक कि सिलीगुड़ी से भी। कोकोमाण्डू के फूल के साथ यहाँ के लोगों के रिश्ते को जानना भी एक खूबसूरत मंजर था। सूरज के आकार के इस सफ़ेद फूल के बगैर यहाँ उत्सव या शुभ कार्य नहीं होता। यह रिवाज़ दरअसल सूरज के प्रति उनके श्रद्धा भाव से गहरा ताल्लुक रखता है। ग्लोब जैसे पृथ्वी का मॉडल है ठीक उसी तरह इनके लिए कोकोमाण्डू का फूल सूरज का मॉडल है।
चारकोल के लोगों का आपसी मेलजोल खास तौर पर उल्लेखनीय है। चाहे पहाड़ के ढलान पर घर बनाने की बात हो या उत्सव की बात हर कोई श्रमदान के लिए तत्पर है। हर हाल में एकता बनाए रखने की कोशिश इनमें दिखती है। चारकोल की खूबसूरती से रिझकर कुछ पर्यटक यहाँ हर साल आते हैं। पर्यटन की संभावनाएं देखते हुए यहाँ कुछ पूंजीपति होटल बनाने के लिए पूंजी निवेश कर रहे हैं। लेकिन सच का एक पहलू यह भी है कि होटल के परिवेश में घर की सी आत्मीयता नहीं होती। मेजबानी यहाँ के लोगों के चरित्र में घुला है। लेकिन पर्यटकों के लिए होटल की सी सुविधाएं उपलब्ध कराने की पूंजी इनके पास नहीं हैं। और न ही शहर के पर्यटकों तक अपने होने की खबर पहुँचने का साधन इन्हें मालूम है। यहाँ आकर होटल में रहने वाले पर्यटक नेपाली संस्कृति को करीब से देखने का मौका खो देंगे। मन में बार बार यह ख्याल आता रहा कि पर्यटन को अध्ययन के विषय के रूप में चुनने वाले विद्यार्थी इन गाँववालों और शहरी पूँजीपतियों के बीच सेतु का काम कर सकते हैं। पूंजीपति अगर इनके मकान का एक भाग लीज़ पर लेने के साथ इसके प्रचार का प्रबंध करें और मेजबानी और खान पान के प्रबंध का भार इन पर सौपें तो मेजबानी से गाँववालों की आमदानी हो पाएगी और पर्यटकों को नेपाली संस्कृति का स्पर्श भी मिल पाएगा। दरअसल यहाँ के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य से गहरा लगाव महसूस करने के कारण मन बाजारी संस्कृति के चारकोल में प्रवेश के ख्याल को परास्त करना चाह रहा था। इस सफर से लौटे हुये काफी दिन बीत जाने के बावजूद वहाँ के लोगों की मेजबानी में शामिल उनकी संस्कृति की गंध मेरी यादों में आज भी तारो ताज़ा है।