Saturday, 23 December 2017

धानी चुनरी आसमानी चादर और जल का आईना / The Paddy Fields, Sky and The Mirror of Water





नवंबर का महीना समाप्त होने के कगार पर था। सर्दियाँ मानो दहलीज़ तक पहुँचकर भी कोलकाता में प्रवेश करने से हिचकिचा रही थीं। हर साल दिसंबर में बड़े दिन की छुट्टियों में मन को प्रकृति की खुली हवा में रमाने की एक आदत से पड़ चुकी थी। लेकिन इस बार कुछ खास वजह से ऐसा करना संभव नहीं हो पा रहा था। इसलिए नवंबर के अंत में ही वर्धमान जिले के यमुनादिघि नामक स्थान पर जाने की योजना बनी। यहाँ राज्य मत्स्य उन्नयन निगम का आम्रपाली पर्यटन केन्द्र ही एकमात्र रहने की जगह है। इस जगह एक बार पहले भी जाना हुआ था। लेकिन न जाने क्यों उस वक्त यहाँ का वातावरण मेरे मन की गहराइयों को छू नहीं पाया था। गेस्ट हाउस का कमरा, समूचे स्थान में झलकती रख-रखाव की कमी और शाम ढलते ही निगलने वाला अँधेरा मन में ऐसा रिसा कि दोबारा वहाँ जाने का ख्याल भी मन में नहीं आया। लेकिन शान्तनु की निगाहों ने इस जगह को एक-दूसरे ही पहलू से देखा था। उसके मन में यहाँ की खुशनुमा छवि कुछ इस तरह रिस गई थी कि उस सफर के बाद वे यहाँ अपने दोस्त विप्लव के साथ दो-दो बार आकर रह चुके थे। उनके लिए यहाँ आना मन को तरोताजा करने का एक जरिया बन गया था। सुबह गाँव की सैर, धान के खेत के बीच से बनी पगडंडियों पर चलना, विशाल धान खेतों के बीच से गुजरी पक्की सड़क पर दूर तक चलना उनके जिंदगी के कुछ सुनहरे पल के रूप में अंकित हो चुके थे।
शांतनु और मेरी एक बात एकदम एक-सी है। दोनों ऐसी जगह जाना पसंद करते हैं जहाँ एक जगह पर बैठकर बहुत दूर तक प्रकृति का खुला प्रांगण दिखाई दे। सुबह सूरज उगने से पहले ही सैर पर निकल जाना और धूप चढ़ने से पहले गेस्ट हाउस में लौटकर वहाँ के लोगों से उस जगह की संस्कृति के बारे में जानना और कुछ पढ़ना और धूप की तीव्रता कम होते ही फिर सैर पर निकलकर शाम ढलने से पहले लौट आना और शाम ढलते ही जम कर अपने अध्ययन कार्य में डूब जाना। हमारे साथ निकलते-निकलते बेटी राशि को भी यही आदत पड़ गई थी। शहरों से दूर बसे गाँव हमें सबसे ज्यादा आकर्षित करते थे। यमुनादिघि के बारे में शांतनु के अनुभवों को देखते हुए मैंने एक और बार वहाँ जाना स्वीकार कर लिया। शान्तनु पिछली बार जिस कमरे में रुके थे हमें वही कमरा मिले इस बात का उन्होंने खास ढंग से ख्याल रखा। सुबह सात बजे हम नैहाटी से माँ तारा एक्सप्रेस पकड़ने के उद्देश्य से घर से रवाना हुए।
रेलगाड़ी से गुसकरा स्टेशन पर उतरकर सड़क मार्ग से सफर शुरू करते ही ग्राम्य जीवन के दृश्यों ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा। दोनों ओर फैले धान के खेत, जहाँ फसलों की कटाई हो चुकी थी और बीच से निकली पक्की सड़क जो टेढ़े-मेढ़े ढंग से बल खाती हुई दूर तक जाती हुई दिखाई दे रही थी। इन दोनों को एक साथ निरखना एक अनोखा अनुभव था।लगभग साढ़े ग्यारह बजे हम अपने गंतव्य स्थल यमुनादिघि के आम्रपाली पर्यटन केन्द्र पहुँचे। पर्यटन केंद्र के खुशमिजाज कर्मचारियों की मेजबानी में अनुभव का एक नया दौर शुरू हुआ।
यमुनादिघि एक बेहद बढ़ा जलाशय था। राज्य मत्स्य उन्नयन निगम ने इस जलाशय को मत्स्य पालन के लिए मिट्टी की दीवार खड़ी करके कुल चौबीस हिस्सों में बाँट दिया। हम कच्ची मिट्टी का रास्ता पकड़कर कई हिस्सों में बँटे यमुनादिघि में पक्षियों का कलरव सुनते हुए और इन पक्षियों की अपने शिकार को पकड़ने की अद्भुत कला देखते हुए काफी दूर तक निकल आए। आम, नारियल, गुलमोहर के वृक्षों से भरे इस स्थल में आँखों को खींच कर रखने की अद्भुत ताकत है। जलाशय के किनारों में कतार में लगे वृक्ष मानो मन को किसी स्वर्गीय लोक में आमंत्रित करते हुए से जान पड़ते हैं।
ऐड़ाल गाँव के इस यमुनादिघि जलाशय में कभी गाँव के लोगों का अबाध प्रवेश हुआ करता था। सर्दियों में अनगिनत पक्षी दूर देश से यहाँ उड़कर आया करते थे। इस बार यहाँ अधिक पक्षी न देखकर मैंने एक स्थानीय व्यक्ति से इसका कारण पूछा। पता चला कि पक्षी बहुत मछलियाँ खा जाती हैं इसलिए इन्हें उड़ाने के लिए यहाँ व्यक्तियों को नियुक्त किया गया है। वे बम या पटाखे की आवाज से इन्हें उड़ाते रहते हैं। वृक्षों का फल और जल की मछली ही इस संपत्ति से आमदनी के दो महत्वपूर्ण साधन हैं। मछलियों को बचाने के लिए पक्षियों को इस तरह उड़ाना स्वाभाविक था। लेकिन फिर भी मन को यमुनादिघि का पूरा चित्रपट पक्षियों की कमी के कारण अधूरा-सा लग रहा था।
सुरक्षा के प्रश्न को ध्यान में रखते हुए गाँव की ओर जलाशय के किनारे से दीवार उठा दी गई थी और ठीक उसके उल्टी तरफ जहाँ खेत थे वहाँ लोहे की तार लगाकर जलाशय तक पहुँचने के रास्ते को बंद कर दिया गया था। चलते-चलते हम जलाशय के उस छोर तक आ चुके थे, जहाँ लोहे के तारों के इस पार हम थे और उस पार पके सुनहले धान के खेत। कई खेतों में धान की कटाई हो चुकी थी। एक खेत में एक बड़ी-सी गाड़ी खेत से धान के पौधों को काटकर धान को उन पौधों से अलग कर दे रही थी। उसी गाड़ी में जोर-जोर से कोई फिल्मी गीत भी बज रहा था। यह दृश्य देखकर मन में अचानक ही यह ख्याल आया कि बहुत दिनों के बाद नागार्जुन को गाँव में आकर धान कूटती किशोरियों के जिस कोकिल कंठी तान को सुनने का सुख मिला था आज वह मंजर कहीं खो गया है। यंत्रों ने मनुष्यों और मनोरंजन के साधनों को किस तरह विस्थापित कर दिया है। गाँव में पलने-बढ़ने वाली नई पीढ़ी को भी आज धान कूटते हुए गाए जाने वाले लोकगीतों को सुनने का मौका नहीं मिल रहा। लोकगीतों के इस अनमोल विरासत को हम कहीं खोते जा रहे हैं। विश्वविद्यालय में लोक संस्कृति, लोकगीतों और लोक तत्वों पर न जाने कितने शोध-कार्य हुए और होते जा रहे हैं। मगर वो कोशिशें कहीं दिखाई नहीं देतीजो वर्तमान गाँवों के लोगों के होठों पर लोकगीत को बचाकर रख सके।
अगले दिन सुबह ऐड़ाल गाँव की ओर हम सैर के लिए सुबह-सुबह निकल पड़े। जलाशय के किनारे बनी दीवार एक जगह टूटी हुई दिखाई दी। यहाँ से होकर गाँव तक कम समय में पहुँचा जा सकता था। थोड़ी ही देर में हम लाल मिट्टी के उस कच्चे रास्ते पर आ गए जो ऐड़ाल गाँव की ओर जाता है। यह रास्ता थोड़ा ऊँचा रास्ता था। नीचे की ओर दूर तक फैले खेत थे। जिन पर गाड़ी से धान की कटाई चल रही थी। कुछ दूरी पर बड़े-बड़े जंगली पेड़ थे। इस जगह पर खड़े होकर कुछ समय के लिए लगा कि हम मैदान में नहीं किसी घाटी में खड़े हैं। इस रास्ते पर थोड़ी देर तक चलने के बाद ही कच्ची मिट्टी से बने घर दिखाई देने लगे। घरों के सामने बड़े-बड़े आंगन थे जहाँ धान को फैलाकर रखा गया था। धान के सूखे पौधों से ही धान रखने के लिए एक विशाल घर-सा बना हुआ था। धान रखने की यह जगह भी लोक शिल्प का एक खास उदाहरण कहा जा सकता है। गाँव वालों से ही पता चला कि धान को गाँव वाले इसके सूखे पौधों से बने आधार में तब तक रखते हैं जब तक इसके अच्छे दाम न मिले। धान, मुर्गियों और बत्तखों के अंडे, गाय और बकरी का दूध इस गाँव के लोगों के आजीविका कमाने के साधन हैं। गाँव में कई बड़े-बड़े पक्के मकान भी दिखे। साथ ही एक मस्जिद भी बनती हुई दिखी।
पिछली बार जब शान्तनु अपने दोस्त के साथ इस गाँव में आए थे तब एक व्यक्ति से भेंट हुई थी जिसका बेटा आई.आई.टी. का छात्र था। और एक व्यक्ति भी मिला था जिसका बेटा बैंगलोर में कार्यरत था। इस बात से यह साफ अंदाजा लगाया  जा सकता है कि गाँव की नई पीढ़ी निश्चित रूप से शहरों की ओर भाग रही है। यदि कृषि क्षेत्र में अनुसंधान के जरिए बीज बोने से लेकर फसल काटने तक की पद्धति को अधिक से अधिक वैज्ञानिक और सुविधाजनक बनाया जाता तो किसान के बेटे कृषि कार्य को ही अत्याधुनिक साधनों के सहारे अधिक चाव लेकर करते। मैंने यह बेहद गहराई से महसूस किया कि कृषि प्रधान देश होने के नाते यह बहुत जरूरी है कि भारत में ऐसे हालात पैदा हों कि किसान का बेटा कृषि कार्य में ही अपने उज्जवल भविष्य का सपना देख सके।
गाँव में भी बड़े-बड़े तालाब दिखे। इन तालाबों में पक्षियों का दल जम कर अठखेलियाँ कर रहा था। यहाँ उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं था। सर्द मौसम की खिली हुई धूप थी और ऐसे में हल्की-हल्की शीतल हवा के बीच तालाबों में उमड़ते पक्षियों का खेल देखने का मजा ही खास था। तालाब के बगल में सोनाझुड़ी वृक्षों के वन में खड़े होकर हम एकटक तालाब और पक्षियों को देख रहे थे। प्रकृति का अपार वैभव मानो मन मस्तिष्क में आनंद का झरना बनकर बह रहा था। यमुनादिघि में तीसरे दिन सुबह हमने धान खेत के बीच से निकली पक्की सड़क पर दूर तक चलने का निश्चय किया। दूर तक फैली सुनहरी धानी जमीन और सिर के ऊपर नीला आसमान और उन दोनों के बीच दूर विभाजक की तरह खड़े हरे पेड़ों की श्रृंखला के बीच हम अपने आपको सृष्टि के कैनवास के अंग-सा महसूस कर रहे थे। नीचे जितनी दूर तक नजर जा रही थी सुनहरे रंग का विस्तार था और ऊपर आसमान की विशाल नीली चादर। राह चलते हुए एक ऐसे व्यक्ति से भेंट हुई जो फसल काटने के लिए गाड़ी भाड़े पर देने का कार्य करता है। उसी ने हमें बताया कि धान का पौधा जब गाड़ी के कटर के जरिए काटा जाता है तब उसी के भीतर बने एक खाने में धान जमा हो जाता है और पौधे का कटा हुआ हिस्सा बाहर निकल आता है। इस गाड़ी के चालक अक्सर पंजाब से आते हैं। जो एक महीना कार्य करने के लिए चालीस हजार लेते हैं। इंटरनेट के जरिए न्यूनतम दस हजार रुपये भेजकर उनसे कार्य करने की जबानबंदी ली जाती है। चालक के तीन वक्त का खाना-पीना और गाड़ी में संगीत की व्यवस्था तो आम बात है। धान की कटाई का काम आसान करने बाजार के रास्ते से आई आधुनिक गाड़ी अपने साथ फिल्मी संगीत की भी संस्कृति लेकर घुस आई। काश कि काम आसान करने वाली गाड़ी के साथ लोकगीत के कोमल तंतुओं का मेलबंधन हो जाता और गाँवों में धान कटाई का मौसम एक उत्सव की शक्ल ले पाता। इस सपने और आज की हकीकत के बीच की खाई को महसूस करके मुझे विश्वविद्यालयों में लोक संस्कृति पर होने वाले तमाम शोध कार्य अधूरे से लगने लगे। रह-रह कर मुक्तिबोध की यह बात याद आने लगी कि ज्ञान के दाँत जिंदगी की नाशपाती में गढ़ने चाहिए ताकि संपूर्ण आत्मा जीवन का रसास्वाद  कर सके।
धरती का सुनहरा धानी चादर देखने के बाद मन में हरे परिधान में इसी धरती को देखने की ख्वाइश परवान चढ़ने लगी थी। इसी ख्वाइश ने हमें स्थानीय लोगों से यह पूछने को मजबूर किया कि किस महीने में यहाँ आने पर खेतों की हरियाली देखी जा सकती है। पता चला कि दुर्गा पूजा के दौरान इन खेतों में लहलहाती हरी धान की फसल देखी जा सकती है। अगर खेतों में कैनल के जरिए सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाए तो माघ के महीने में भी हरी फसल दिख सकती है। इस महीने के धान की खेती को यहाँ बोरो चाशकहते हैं। धान की यह फसल पूरी तरह से कृत्रिम सिंचाई की व्यवस्था पर निर्भर करती है। सीमित जल के कारण जिन ग्रामों को बोरो चाशके लिए जल नहीं मिल पाता उन ग्रामों की जमीन साल भर के लिए बेकार ही पड़ी रहती है। यमुनादिघि के गेस्ट हाउस के कमरे के बरामदे से दूर तक हमें जो खेत फैले दिखाई दे रहे थे उन खेतों को अगर बोरो फसल के लिए कैनलों के जरिए सिंचाई का जल न मिले तो वह साल भर खाली ही पड़े रहते हैं। यहाँ काम करने वाली एक महिला ने बताया कि अगर कैनल से पानी न मिले तो माघ के महीने में हरे चादर ओढ़े हुए खेत देखने आने की ख्वाइश पूरी न हो सकेगी। इस बात को सुनकर मन ख्वाइशों की गली से बाहर निकलकर एक ऐसी गली में जाकर दाखिल हुआ जहाँ मन में रह-रह कर यह सवाल उठने लगा कि दो-तीन महीनों में ही उन्नत फसल देने की क्षमता रखने वाले बीज आज उपलब्ध होने के बावजूद सिंचाई के लिए आवश्यक जल की अनुपलब्धता मिट्टी से सोना उगाने की राह में बाधक बनकर खड़ी हो रही है। खेतों तक जल पहुँचाने वाले कैनलों का बाँधों से संबंध बाँधों से कितना पानी किस राज्य को मिलेगा या नदी से कितना पानी किस देश को मिलेगा कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर किसानों का भाग्य निर्भर करता है। मन ने पहली बार यह महसूस किया कि अन्न उगाने वाले हमारे हकीकत के अन्नदाता किसानों के हाथ किस कदर बँधे हुए हैं। मेरे साथ बेटी राशि भी इस बात को समझ पा रही थी कि जो चावल मूल्य देकर बाजार से आसानी से मिल जाता है उसके साथ किसानों की जी-तोड़ मेहनत और जिजीविषा दोनों का गहरा संबंध है।
किसानों के जीवन को यहाँ आकर गहराई से देखने का मौका मिला। खून पसीना एक करके धान उगाने वाले किसान की मजबूरी भी साफ दिखाई पड़ी। राइस मिलपर सरकार का अख्तियार न होना और इसलिए कम दामों में ही किसानों के धान को बेच देने की मजबूरी उनको धान का वाजिब दाम नहीं दिलवा पा रही। आलू की खेती करने वाले किसानों के साथ भी यही समस्या है। सरकारी ठंड़े गोदामों की कमी के कारण किसानों को या तो वाजिब दाम न मिलने तक आलू को सुरक्षित रखने के लिए ठंडे गोदामों के मालिक को भाड़ा देना पड़ता है या फिर कम दामों में इसे बेच देना पड़ता है। मन में अनायास ही यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि कॉमर्स क्षेत्र में शोधकार्य करने वाले विद्यार्थी अगर ऐसे व्यावहारिक समस्याओं के समाधान खोजने के लिए शोधकार्य करते तो शिक्षा पर सरकार द्वारा किया जाने वाला विपुल व्यय सार्थक हो पाता।
प्रकृति की गलियों में घूमते हुए मन मानो कुछ समय के लिए व्यावहारिक समस्याओं के घने जंगल में फँस गया था। आम्रपाली पर्यटन केन्द्र के जलाशय में नौकाविहार मन को फिर से प्रकृति के साये में ले आया, प्लास्टिक के पैडल बोट पर चढ़कर नौकाविहार एक यादागार मंजर बनकर रह गया। आम, नारियल, गुलमोहर के वृक्षों से घिरे जलाशय में नौका विहार करते हुए किनारे बैठे कुछ सफेद पंछियों को देखना एक खूबसूरत अहसास था। जलाशय के किनारे लगे गुलमोहर के पेड़ों पर जब फूल खिले हों तब यही नौकाविहार कितना मनोरम होगा यह महसूस करके मन में गुलमोहर के फूलों से लदे पेड़ और लहलहाते हरे खेत दिखाई देने की ऋतु में यहाँ आने की इच्छा मानो जमकर बैठ गई।
दोपहर को भेल्की नामक गाँव में साल वृक्षों के वन के बीच बसे स्थान भेल्की मचान में जाने की योजना पहले से बनी हुई थी। साल वृक्षों के वन और सोनाझुरी वृक्षों के वन के बीच से पक्की सड़क बल खाती हुई भेल्की मचान की ओर चली गई थी। रास्ते में सदियों पहले भेल्की के जमींदारों द्वारा बनाई गई इमारतों के ध्वंसावशेष भी दिखाई पड़े। वन के बीच जलाशय भी थे। रख-रखाव की कमी, तालाब के अपरिष्कृत जल और उस जल में रखे दो टूटे-फूटे नावों को देखकर मन भेल्की मचान में रम नहीं पाया। थोड़े ही समय में हम बाहर निकलकर साल वृक्ष के वन के बीच से गुजरी पक्की सड़क की निर्जनता को महसूस करके तृप्त होने लगे। भेल्की मचान के पास ही पुराने ईंटों से बना एक लम्बा ढाँचा दिखा। ड्राइवर ने बताया यह कभी जमींदारों का वाच टावरहुआ करता था। फिर नक्सलों के ज़माने में इसके नीचे सुरंग खोदा गया। उस सुरंग को अब लोहे के गेट से बंद कर दिया गया है।
धानी जमीन के इस सौंदर्य को छोड़कर शहर लौटने का दिन हाजिर था। हम सुबह की सैर पर निकलकर यमुनादिघि के आखिरी छोर तक गए। लोहे के तारों को पार करके हम खेत की ओर आ गए थे। खेत और यमुनादिघि जलाशय के बीच बने टेढ़े-मेढ़े कच्चे रास्ते पर चलते हुए सुबह की हल्की धूप और ताज़ी हवा जैसे जेहन में रिस रही थी। दूर के कुछ खेतों में लोग धान के सूखे पौधों का गट्ठर बाँध कर गाड़ी में रख रहे थे। एक खेत में धान की कटाई के लिए गाड़ी खड़ी दिखाई दी। दूर से एक व्यक्ति बैलगाड़ी लेकर जाता हुआ दिखा। उधर हमारे दाहिने तरफ पानी में बत्तखें तैर रही थीं और सफेद, भूरे रंग के पक्षी अपनी लम्बी गर्दन तानकर जलाशय के किनारे शिकार की टोह में बैठे थे। जलाशय और खेतों के बीच विभाजक रेखा-सी बनकर गुलमोहर के पेड़ कतार में खड़े थे। मन में इस दृश्य की ऐसी तस्वीर खिंची जिसे शब्दों में बयान करना कठिन है। इसी तरह चलते हुए जब घास पर जमें ओस कण पर नजर पड़ी तब कविगुरु रवीन्द्रनाथ की वह पंक्तियाँ अनायास ही याद आई जिनमें यह भाव व्यक्त था कि मैं नदी, पर्वत सागर देखने कितनी दूर-दूर तक गया लेकिन घास पर जमे ओस के एक कण के सौंदर्य को कभी देख ही नहीं पाया।

बंगाल का एक खूबसूरत शहर / A Beautiful City of Bengal




मई-जून की छुट्टियों में मन को तरोताजा करने के लिए प्रकृति में रमकर समय बिताने की आदत अब गहरी चाहत बन गई थी। इस साल मई-जून की कार्यसूची इस चाहत को पूरा करने की इजाजत नहीं दे रही थी। लेकिन गर्मियों की छुट्टी में प्रकृति के साये में वक्त बिताकर मन की बैटरी को चार्ज करना भी जरूरी थ। जहाँ चाह वहाँ राह के न्याय से अप्रैल के महीने में गुड फ्राइडे, बांगला नया साल का प्रथम दिन और रविवार का एक के बाद एक पड़ना हमें एक और प्राकृतिक अनुभव हासिल करने का मौका दे गया। बंगाल के सौंदर्य को अलग-अलग प्राकृतिक स्थलों में वक्त बिताकर महसूस करने का सिलसिला तो हमने बहुत पहले ही शुरू कर दिया था। इस बार उसी कड़ी में एक और नाम हल्दिया का जुड़ गया। इस सफर पर जाने के लिए विशेष तैयारी की जरूरत नहीं थी। घर से ही अपनी गाड़ी में जरूरत का सामान लेकर हमने हल्दिया के लिए लांग ड्राइव आरंभ की। जाना पहचाना नेशनल हाइवे सोलह का मसृण रास्ता पकड़ते ही मन शहरी भीड़ भाड़ से मुक्ति के पल महसूस करने लगा था। गंगा नदी और कोलाघाट में रूपनारायण नदी को पार करके गाड़ी हल्दिया की ओर बढ़ रही थी। कोलाघाट पार करते ही रास्ते के दोनों ओर लगे वृक्षों का घनत्व बढ़ गया था। जिसके चलते वन्यता का रंग हवा में घुल रहा था। उस पर आने और जाने के रास्तों के बीच के विभाजक स्थल में बेतरतीब उगे झाड़ झंखाड़, कहीं फूलों के वृक्ष तो कहीं बड़े पेड़ इस वन्यता को और बढ़ा रहे थे। इस तरह आगे बढ़ते हुए दूर से जहाज के लंगर के आकार का हल्दिया का प्रवेश द्वार दिखा। हुगली और हल्दी नदी के संगम स्थल पर पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले में बसे इस शहर में जहाँ हरियाली दिखी वहीं बड़े जहाज, नाव, माल उठाने वाले क्रेन भी दिखे। यहाँ पेट्रो केमिकेल फैक्ट्री में कार्यरत लोगों के रहने के लिए कई टाउनशिप सुनियोजित ढंग से बने हुए थे। रास्तों के दोनों ओर लगे पाम के वृक्ष रास्ते की शोभा बढ़ा रहे थे। जमीन से कुछ ऊँचाई तक सफेद रंग से रंगे पेड़ के तने खूबसूरती को बढ़ा रहे थे। देखते ही देखते हमारी गाड़ी हल्दिया भवन प्रांगण में प्रवेश कर गई।
सुना था हल्दिया के सौंदर्य को अगर गहराई से महसूस करना हो तो हल्दिया भवन में रहना जरूरी है। इस बात का अहसास यहाँ पहुँचते ही हो गया। रंग बिरंगे फूलों से सजे लॉन, भवन से नदी को जोड़ने वाले एक छोटे से कच्चे रास्ते और उस रास्ते के खत्म होते ही नदी के विस्तृत वक्षस्थल को भवन के बरामदे से निरखना एक अनोखा अनुभव था। बरामदे से ही नदी के समांतर बने रास्ते के किनारे लगे पाम के वृक्ष और दो वृक्षों की दूरी पर बैठने के लिए बने बेंच दिख रहे थे। बड़े-बड़े जहाजों को यहीं बैठकर गुजरते हुए देखने का मंजर भी रोमांचक था।
कोलकाता पोर्ट के कार्यभार को हल्का करने के लिए बना हल्दिया डॉक कॉमप्लेक्स हल्दिया शहर के विकसित होने का मूल कारण है। अंग्रेजों ने अपने औपनिवेशिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही कोलकाता पोर्ट को विकसित किया था। लेकिन आजादी के बाद इस जगह का प्रयोग देश के विकास के उद्देश्य से होने लगा। हल्दिया केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे पूर्व भारत में तेजी से उभरने वाले औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है। पेट्रो केमिकल उद्योगों से भरे इस जगह को हुगली और हल्दी नदी के संगम और देवदारू, पाम और अन्य कई बड़े-बड़े वृक्षों के साये ने अनोखी शोभा से भर दिया है। उस पर हल्दिया भवन के आस-पास के इलाके की निर्जनता ने यहाँ के वातावरण को संगीत से भर दिया है।
हालांकि गर्मी ने दरवाजे पर दस्तक दे दी थी फिर भी बंगाल की खाड़ी के करीब का यह इलाका जल की नमी से भरी हवा के कारण ठंडक को संजोए हुए था। ऐसे वातावरण में घने पेड़ों के बीच से कोयल का कूकना एक मनोरम अनुभव था। ऐसे मौसम में हम सूर्यास्त का खास अनुभव प्राप्त करने के लिए बालूघाट की ओर रवाना हुए। नदी के समांतर दूर तक चले गए रास्ते पर ही वह स्थल था जहाँ से सूर्यास्त का सौंदर्य बड़ी शिद्दत से महसूस करना संभव था। उस जगह तक पहुँचने से पहले ही हल्दी नदी के ही किनारे बसे बड़े-बड़े मत्स्य पालन के जलाशय थे। मिट्टी की एक दीवार हल्दी नदी और इस जलाशय के बीच विभाजक का काम कर रही थी। इस जलाशय में कुछ चरखे चलते हुए दिखाई दिए। दरअसल छोटी मछलियों में पानी से ऑक्सीजन खींचने की क्षमता कम होती है। पानी में विद्युत के जरिए जब चरखे चलते हैं तो उसमें कंपन पैदा होता है। यह कंपन छोटी मछलियों के बढ़ने के लिए आवश्यक स्थिति प्रदान करता है। रास्ते के दोनों ओर बने जलाशय और जलाशय के उस पार हल्दी नदी का नजारा आँखों को ठंडक दे रहा था। लहरों की कल कल आवाज के बीच ठंडी हवा का बहना और रास्ते के किनारे बने बेंच पर बैठकर नदी की पृष्ठभूमि में क्रमश: लाल होते हुए डूबते सूरज को देखना एक अविस्मरणीय पल था।
सूर्यास्त के बाद हम हल्दिया मेरीन ड्राइव पहुँचे। हल्दी नदी के किनारे बसा यह स्थल यहाँ रहने वालों के लिए भी एक विशेष आकर्षण केन्द्र है। रास्ते के किनारे एक पंक्ति में खड़े पाम के वृक्ष, सजीली रोशनी, जगह-जगह पर बनी खूबसूरत मूर्तियाँ और बैठने की खूबसूरत व्यवस्था ने इस जगह में एक अलग सौंदर्य भर दिया है। मेरीन ड्राइव के अंत में बना पार्क भी इस इलाके का एक विशेष आकर्षण केन्द्र है। सुबह शाम यहाँ लोग नदी की ताजी हवा खाने आते हैं। प्रकृति की यह अद्भुत देन यहाँ के लोगों को मिला एक उपहार ही है। यहाँ से उस पार नन्दीग्राम का तट दिखाई दे रहा था। कुछ साल पहले नन्दीग्राम का नाम सुनते ही जो भयानक छवि आँखों के सामने उभर आती थी आज के अनुभव ने उस छवि की जगह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर एक नई छवि बना दी थी। इस जगह को सूरज की रोशनी में एक बार फिर देखने की चाह को मन में भरकर हम हल्दिया भवन रवाना हुए।
हल्दिया भवन पहुँचते ही संगम स्थल से आ रही तीव्र रोशनी ने हमारा ध्यान खींचा। यह रोशनी नदी के किनारे खड़े हुए विशालकाय जहाज से आ रही थी। पूछने पर पता चला कि ऐसे जहाज हल्दिया स्थित तीसरी तेल जेट्टी पर बंबई से तेल लेकर आते हैं और पाइप लाइन के जरिए तेल को गंतव्य स्थल तक पहुँचाकर वापस लौट जाते हैं। जहाज की उस रोशनी को देखकर अनायास ही विद्यालय में पढ़े अध्यायटाईटेनिककी याद आ गई। हल्दिया भवन के ठीक सामने नदी के किनारे बने बेंच पर बैठकर उस जहाज की रोशनी को लहरों की आवाज सुनते हुए निरखना बेहद सुखद था। उस पर जल से नम हुई गर्मियों के मौसम की हवा उस क्षण को और भी मनोरम बना रही थी।
हल्दिया की खूबसूरती को और भी गहराई से महसूस करना हो तो सुबह पांच बजे तक सुबह की सैर पर निकल पड़ना जरूरी है। इसी निश्चय के साथ हम अगले दिन सुबह-सुबह सैर पर निकल गए। हल्दिया टाउनशिप के चौड़े मसृण रास्ते और सजीला हरा वातावरण मानो सुबह की हवा के साथ मन में रिस रहा था। चलते हुए हम फिर मेरिन ड्राइव के सौंदर्य को सूरज की रोशनी में निरखने के लिए वहाँ पहुँच गए। छटे हुए घास के लॉन के बीच नदी के किनारे कतार से लगे पाम वृक्ष और बैठने के लिए पक्के बेंच उस पर नदी को छूती हुई आती तेज हवा ने हमे खामोश होकर इस वक्त की तस्वीर और अहसास को मन में संजोने के लिए मजबूर कर दिया। कुछ आगे चलकर नगरपालिका द्वारा नदी के किनारे टाइल्स से बनाए गए फुटपाथ और जगह-जगह बनी मूर्तियाँ थीं। लेकिन उस कृत्रिम सौंदर्य से कहीं ज्यादा आकर्षक था छटे घास का नैसर्गिक लॉन। आगे चलकर जेट्टी थी जहाँ मछुवारे रोज नयाचर या मीन द्वीप से मछली लेकर बेचने आते हैं। साथ ही नन्दीग्राम आने जाने वाले भी इसी जेट्टी का प्रयोग करते हैं। पर्यटकों को मीन द्वीप तक जाना हो तो मछुवारों के नाव में ही जाना पड़ता है। बांगला में नदी द्वारा बहा कर लाई गई मिट्टी के जमने से बनने वाले भूखंड कोचरकहते हैं। यह द्वीप काफी पुराना नहीं है। इसलिए इसेनयाचरकहते हैं। यह द्वीप आजचींगड़ीनामक मछली के सर्वाधिक उत्पादन के लिए विश्व में प्रसिद्ध है। इसी वजह से संभवत: इसेमीन द्वीपभी कहते हैं।
हमारी किस्मत हमें पहले दिन से ही बार-बार हल्दिया डॉक कॉमप्लेक्स के सेवानिवृत्त सज्जन श्रीपतिचरण दास से मिला रही थी। पहले दिन ही शाम को मेरीन ड्राइव की सैर करते हुए हमने उनसे नयाचर के बारे में पूछा था। अगले दिन सुबह उन्हें फिर मरीन ड्राइव में सैर करते हुए पाया। उनसे रामकृष्ण मिशन द्वारा परिचालित मुक्तिधाम मन्दिर का रास्ता पूछते ही उनके व्यक्तित्व का समाज सेवी पहलू उभर कर सामने आया। रामकृष्ण मिशन से जुड़कर वे सत्रह साल सेवा निवृत्त जीवन व्यतीत करने के साथ-साथ समाज सेवा का कार्य भी कर रहे थे। ताजी हवा और सेवा कार्य में मन को रमाए रखने के कारण ही शायद उन्हें देखकर उनकी उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था। मुक्तिधाम मन्दिर के बारे में पूछते ही उन्होंने न सिर्फ रास्ता बताया बल्कि उनकी पत्नी की अंतरंग सहेली काजल दी से भी संपर्क करके उन्हें बताया कि हमारी आज उस मन्दिर में जाने की योजना है। काजली दी मुक्तिधाम मन्दिर के बगल में स्थित शारदा मिशन की सन्यासिनी हैं। सन्यास के बाद उन्हें प्रेमानन्दमयी नाम दिया गया। इस अद्भुत सन्यासिनी से मिलने का सौभाग्य भी हमें श्रीपति जी से मिलने के कारण ही प्राप्त हो पाया।
सुबह का नाश्ता करके ही हम नहा धोकर मुक्तिधाम मन्दिर के लिए रवाना हुए। इस बीच प्रेमानन्दमयी माँ से भी फोन पर बात हो गई थी। मुक्तिधाम मन्दिर हल्दिया भवन से लगभग 21 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहाँ पहुँचते ही दक्षिण भारत के लहजे पर बने नक्काशीदार सफेद गेट ने हमारा ध्यान खींचा। गेट का फाटक किसी राजमहल के फाटक जैसा था। फाटक से प्रवेश करते ही रास्ते के बीचोबीच और दोनों तरफ देवदारू के सजीले छटे हुए पेड़ नजर आए। उस फाटक से प्रवेश करने का अनुभव किसी राजमहल में प्रवेश करने के अनुभव से कम नहीं था। कुछ दूरी तक चलकर बाईं ओर प्रार्थना गृह स्थित है, जो थोड़ी ऊँचाई पर है। प्रार्थना गृह में राधाकृष्ण और काली माँ और हनुमान जी की मूर्तियाँ हैं। इस गृह का परिवेश ध्यान के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। इस प्रार्थना गृह के बरामदे से एक गुफा नजर आती है जिसके ऊपर शिवजी का मन्दिर है। मुक्तिधाम मन्दिर के विशाल प्रांगण की सैर करते हुए हम ठीक उसके विपरीत स्थित शारदा मिशन सेवाश्रम पहुँचे। वहाँ हमें प्रेमानन्दमयी माँ हमारा इन्तजार करती हुई मिली।
प्रेमानन्दमयी माँ से शारदा मिशन सेवाश्रम का इतिहास सुनकर उनके प्रति और इस आश्रम के प्रतिष्ठाता भक्ति चैतन्य जी के प्रति हमारा श्रद्धा भाव उमड़ पड़ा। लगभग उन्नीस सौ साठ के आसपास भक्ति चैतन्य ने सेवा भाव से प्रेरित होकर ही गाँव के बच्चों खास कर लड़कियों को शिक्षा देने के उद्देश्य से बड़ी लगन से एक विद्यालय को चालू करवाया। लेकिन काफी क्लेश का सामना करके वे उस विद्यालय से खुद को अलग करने के लिए मजबूर हो गए। लड़कियों की शिक्षा का प्रबंध करने की धुन उन पर सवार थी। इसी धुन ने उन्हें शारदामनी बालिका विद्यालय की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया। प्रेमानन्दमयी माँ इसी विद्यालय की छात्रा थी और सेवाभाव उनमें इस तरह कूट-कूट कर भर गया था कि महिषादल में स्थित अपना घर छोड़कर उन्होंने सन्यासिनी जीवन अपना लिया। आज शारदा मिशन सेवाश्रम लगभग सत्रह नेत्रहीन बालिकाओं को कारीगरी की शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ सौ से भी अधिक नेत्रहीन विद्यार्थियों को बालिका विद्यालय में शिक्षा भी प्रदान कर रहा है। कुल चार सन्यासिनें और चार ब्रह्मचारिणियाँ मिलकर इस आश्रम को संभालती हैं। इतना ही नहीं आश्रम के बालिकाओं की नेत्र संबंधी समस्याओं को देखते हुए इसी आश्रम के प्रयास से एक नेत्र अस्पताल भी यहाँ खुल गया है। सेवाकार्य के प्रथम प्रयास में क्लेश पाकर भक्ति चैतन्य जी निराश होने के बजाय दुगनी उर्जा से सेवा कार्य में लग गये थे। उस प्रयास का फल उनके द्वारा प्रतिष्ठित विवेकानन्द मिशन आश्रम, शारदा मिशन सेवाश्रम, नेत्र अस्पताल, विवेकानन्द मिशन मन्दिर, विवेकानन्द मिशन महाविद्यालय, शिक्षायतन भव्य रूप में हमारे सामने खड़ा था। प्रेमानन्दमयी माँ के उष्णता पूर्ण स्वागत और सहजता ने हमारा मन मोह लिया। हमने नेत्रहीन बालिकाओं द्वारा बनाई जाने वाली वस्तुओं और उनके कार्य स्थल को भी देखा। उन्हीं से यह जानकारी मिली कि शेक्सपीयर सरणी स्थित ऋषि अरविन्द भवन यहाँ की बालिकाओं द्वारा बनायी गए वस्तुएँ खरीद लेता है। इसी के चलते इस गाँव में भी इस तरह का कार्य चला पाना संभव हो पा रहा है। इतना ही नहीं समय-समय पर कई धनी व्यक्तियों ने दान के जरिए इस आश्रम के विकसित होने में गहरा सहयोग दिया है। मानव संसाधनों की कमी और आर्थिक सहयोग की अनिश्चितता के बीच प्रेमानन्दमयी माँ इस अखंड विश्वास के साथ हमेशा चिन्तामुक्त रहती हैं कि जब इस जगह को बचाए रखने की जिम्मेदारी ईश्वर की है तब हमारे चिंतित होने का कोई मतलब ही नहीं बनता।
पहले दिन बालूघाट से लौटते हुए हम एक जाऊ वृक्ष का वन देखकर रुक गए थे। उसी वन से होकर एक कच्चा रास्ता सीधे नदी तक पहुँच गया था। निर्जनता, वन्यता, खामोशी, नदी का खूबसूरत नजारा एक साथ उस स्थान में खूबसूरत रंग घोल रहे थे। उस पर एक घने पेड़ के नीचे किसी ने शिवजी की एक छोटी-सी मूर्ति रख दी थी। नदी के किनारे शान्ति में डूबे वातावरण के बीच हवा के सरसराते हुए पेड़ों के बीच से गुजरने और उस पर नदी किनारे के खेतों के बीच एक घने पेड़ के नीचे शिवजी की मूर्ति प्राचीन युग का आभास दिला रही थी। हमारी इच्छा थी कि अगले दिन भी यहीं बैठकर सूर्यास्त देखें। लेकिन मेरीन ड्राइव के विद्यासागर पार्क में समय बिताने के कारण यहाँ फिर से आना नहीं हो पाया। इसी के साथ हल्दिया पत्तन के जहाजों को करीब से देख पाने की इच्छा भी समय की कमी के कारण स्थगित रह गयी। इन्हीं अधूरी इच्छाओं के कारण हम यहाँ से रवाना होने से पहले ही यह तय कर बैठे कि शीघ्र ही हल्दिया में हम अपने माता-पिता के साथ हाजिर होंगे।





Thursday, 23 November 2017

देवभूमि उत्तराखंड में बीते चंद दिन / Few Days Spent in 'Devbhoomi' (Land of Gods) Uttarakhand




कुछ सालों से दुर्गापूजा की छुट्टियों में शहर के शोर शराबे से कहीं दूर जा कर समय बिताने की ख्वाहिशें मन को घेरने लगी थीं। दुर्गापूजा में बंगाल के विशिष्ट वाद्ययंत्रढाककी आवाज आजकल कहीं खो सी गई है। पॉप और रैप संगीत की आवाज दिलो दिमाग पर हथौड़े की मार जैसी महसूस होती है। दुर्गा पूजा के कुछ दिन धरती पर माँ दुर्गा के आगमन के दिन माने जाते हैं। कभी-कभी यह महसूस होता है कि इतने शोर शराबे, खान पान की दुकानों की भीड़ और लाउड स्वीकरों की आवाजों के बीच क्या वाकई माँ दुर्गा का यहाँ कुछ पल के लिए भी ठहरपाना संभव है? पंडालों में माँ की मूर्ति है और लाउड स्पीकर पर फूहड़ संगीत बज रहे हैं। सांस्कृतिक स्खलन के ऐसे दृश्यों का साक्षी बनने से पहले ही मन और आँखें प्रकृति के किसी ऐसे स्थान पर पहुँच जाना चाहती थीं जहाँ शान्तिपूर्ण वातावरण में अपनी सृजन शक्ति को पर खोलने का मौका दिया जा सके। अपनी ख्वाहिशों को पंख देने के लिए हमने इस बार देवभूमि उत्तराखंड जाने का निर्णय लिया। इस बार मेरे साथ शान्तनु और बेटी राशि के अलावा शान्तनुके दोस्त प्रणव, उनकी पत्नी मैरी और बेटा प्रमीत भी था। हम सबके सोच की समानता ने हमें इस सफर में एक साथ बाँध दिया था। हिमालय के पर्वत श्रृंखला के ऊँचे पहाड़, पहाड़ों पर जमी बर्फ की श्वेत धवल आभा और उस पर देवभूमि की हवाओं में घुला अपना रंग जैसे हमें बरबस ही अपनी खींच रहा था। नैनीताल, रानीखेत, कौसानी, मुँशीयारी, अल्मोड़ा का यह सफर मेरे जीवन का अब तक का सबसे लम्बा सफर था। 

 उत्तर प्रदेश से उसके पहाड़ी इलाकों को अलग करके उत्तराखंड राज्य बना है। इसका जिक्र प्राचीन ग्रंथों में केदार खंड और मानस खंड के सम्मिलित क्षेत्र के लिए किया गया है। प्राचीन काल से ही इसके ऊँचे शिखर और इसकी घाटियों को देवी देवताओं का निवास स्थल माना जाता रहा है। ऐसा माना जाता है कि व्यास मुनि ने महाभारत की रचना यहीं पर की थी। और पांडवों ने भी इसी इलाके में अपना बसेरा बनाया था। सम्राट अशोक के कलसी के अभिलेख से यह भी पता चलता है कि यहाँ की भूमि में बौद्ध धर्म ने भी कदम रखे। मन में बसी यहाँ की शान्तिपूर्ण और ऐश्वर्यमयी छवि ही हमें मानो देवी के पृथ्वी पर आगमन के चंद दिनों को गहराई से महसूस करने का निमंत्रण दे रही थी।

 लालकुआँ स्टेशन पहुँचकर सड़क मार्ग से हमारा नैनीताल जाने का सफर शुरू हुआ। पहाड़ के पदतल पर हरियाली के बीच खड़े छोटे-छोटे मकानों ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा। हरियाली और ताज़ी हवा के बीच बहती चंचल गौला नदी का सौंदर्य मन को गहराई से छू रहा था। हमें भीमताल और नौकुचिया ताल से होते हुए नैनीताल पहुँचना था। माना जाता है कि भीम ने अपने गदे के प्रहार से भीमताल की रचना की थी। नौकुचिया ताल नौ कोने वाला ताल है। माना जाता है कि इस ताल के नौ कोनों जिसे एक साथ दिख जाएँ वह अत्यंत सौभाग्यशाली होता है। पहाड़ से घिरी झील का दृश्य आँखों को ठंडक दे रहा था।नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थितओक रिज होटल में रात्रि निवास का कार्यक्रम तय था। होटल की बड़ी काँच की खिड़की से नैनी झील का नजारा मन की गहराइयों को छू रहा था। झील के उस पार के पहाड़ पर बने घर खिलौनों के घर जैसे दिख रहे थे। हरियाली के बीच बसे त्रिकोणाकार छतों वाले घर किसी चित्रकार द्वारा बनाए गए चित्र जैसे लग रहे थे। नैनी झील में तैरती मछलियों के झुंड के पानी में डाले गए दानों को लपकने के लिए बार-बार किनारे की ओर आने की प्रक्रिया को खड़े-खड़े निरखना एक अद्भुत अनुभव था। 

नैनी झील के एक छोर में नैना देवी का मंदिर स्थित है। माँ पार्वती के नैन यहीं पर गिरे थे। झील के एक छोर से मन्दिर प्रांगण तक नाव जाती है। जल पथ से नौका विहार करते हुए पहाड़ों से घिरे नैना देवी मंदिर के प्रांगण तक पहुँचने का अनुभव किसी के लिए भी यादगार सफर बन जायेगा। उस पर मंदिर का अनोखा वातावरण भी मन की गहराइयों को छू लेता है। पहाड़ से नैनी झील को देखना और नैनी झील पर नौका विहार करते हुए पहाड़ को देखना स्वर्ग से धरती को और धरती से स्वर्ग को देखने के बराबर था। यह जगह ऐसी थी जहाँ धरती और स्वर्ग मानो मिल गए थे।मंदिर दर्शन के बाद हम नैनी झील को घेर कर खड़े पहाड़ के शिखर की ओर निकल पड़े थे। शिखर पर लोग हिमालय दर्शन के लिए आते हैं। आसमान साफ हो तो बर्फ से ढ़की हिमालय की चोटियाँ नज़र आती हैं। इसी जगह पर कुमायूँ मंडल विकास निगम का एक होटल है जो कभी ब्रिटिशों का बांग्ला हुआ करता था। इसी जगह पर दो सौ वर्ष पुराने जिंको विलोबा का वृक्ष दिखा। इस वृक्ष का हर अंग औषधि बनाने के काम आता है। इस वृक्ष की यह खासियत है कि इसके नर और मादा वृक्ष एक ही जगह पर मिलते हैं।नैनी झील ऊपर से आम के आकार की दिख रही थी। ऊपर से झील की पानी का रंग भी नीली आभा लिए हुए दिख रहा था। पहाड़ियों से घिरी इस नीली झील को देखना मानो कहीं स्वर्ग से एक टुकड़ा आसमान देखने के बराबर था। सिर के ऊपर दिखने वाला आसमान मानो आज जमीन पर उतर आया था।

 हिमालय कई महान ऋषियों का आश्रय स्थल रहा है। यहाँ के वातावरण की अद्भुत शांति ने महापुरुषों को ईश्वरीय अनुभूति करवाई थी। शिवत्व यहां कण-कण में बसा है। ऋषियों ने पहाड़ों की गोद में स्वयंभू शिवलिंग (अपने आप बनने वाला शिवलिंग की आकृति का पत्थर) पाकर शिव का ध्यान लगाकर इन्द्रियों पर विजय हासिल करते हुए परम शान्ति का अनुभव किया। ऐसा ही एक स्थान है हनुमान गढ़ी। नीब करौरी बाबा द्वारा खोजा गया यह स्थान कदम रखते ही मन को शान्त करने की उसकी शक्ति का एहसास दिला देता है। निस्तब्धता की भी एक ध्वनि होनी है। इस ध्वनि का एहसास मुझे इस जगह पर आकर हुआ। ठीक यही एहसास मुझे एक बार फिर कैंची स्थित नीब करौरी बाबा के आश्रम में हुआ। पहाड़ की गोद में बसे इस आश्रम से सटकर शिप्रा नदी बह रही है। छोटे से एक पुल से शिप्रा नदी को पार करते हुए नीब करौरी बाबा के कैंची धाम में पहुँचकर मन में अद्भुत शान्ति फैल गई थी।

 उत्तराखण्ड अकेला एक ऐसा राज्य है जिसके दो राजभवन हैं। एक राजभवन नैनीताल में स्थित है। इस भवन की बनावट स्कॉटिश महल की-सी है। सन् 1899 में बनी इस इमारत के निर्माण में ईंट, सीमेंट और बालू की जगह चूना, गुड़ और दाल का प्रयोग किया गया है। उस युग में इमारत बनाने के लिए इन्हीं चीजों का इस्तेमाल होता था। यह यूरोपीय लहजे में गॉथिक वास्तुकला के आधार पर बनी इमारत है। 205 एकड़ तक फैले इस इमारत के प्रांगण में गॉल्फ कोर्स, स्वर्गीय उपवन, स्वीमिंग पुल स्थित है। यह भारत का एक ऐसा राजभवन है जिसके दरवाजे पर्यटकों के लिए खुले हैं। इस आलीशान इमारत की भीतरी सजावट भी आलीशान है। ब्रिटिश काल के असबाब, बेल्जियम कांच से बने आईने से लेकर छाता रखने के स्टैण्ड तक एक राजशाही ठाट फैली हुई थी। 

नैनीताल से लगभग ढाई घंटे का सफर तय करके हम रानीखेत पहुँचे। रानीखेत में महातपा ऋषि के अवतार माने जाने वाले हेडाखान के आश्रम के पास ही कुमायूँ मंडल विकास निगम के हिमाद्री टूरिस्ट रेस्ट हाउस में हमें रहना था। इस इलाके के जंगल का एक अलग सौंदर्य है। यहाँ पेरुल के वृक्षों का घनत्व जंगल को अंधकार में नहीं डुबोता। अपने ही फल के बीज से उगने वाले पेरूल के वृक्षों के बीच की हरी घास साफ दिखाई देती है। इस जंगल को देखकर ऐसा लगता है मानो किसी ने योजनाबद्ध ढंग से इन्हें लगाया हो। 

रानीखेत का सफर विश्वविद्यालय के दोस्त मिथिलेश और मेनका की मौजूदगी के कारण यादगर सफर बन कर रह गया। रेस्ट हाउस पहुँचते ही मुझे सूचना मिली कि मिथिलेश और मेनका कुछ घंटे पहले ही हमारा इंतजार करके लौट गये थे। इस सूचना के मिलते ही मैंने मिथिलेश को मेरे पहुँचने की सूचना दी और कुछ ही मिनटों में मिथिलेश और मेनका दोनों मेरे इस दो दिनों के डेरे में पहुँचे। बरसों पुरानी यादें उनसे मिलते ही ताजा हो गईं। उम्र ढ़लने के साथ पुराने दोस्ताने रिश्ते और भी गहरे हो जाते हैं। इस बात का एहसास उनसे मिलने के साथ ही हुआ। वे दोनों अगले दिन के रात्रि भोज का न्यौता देकर गए। सूने पहाड़ों में अचानक अपनों से बरसों बाद मिलने का एहसास कितना खूबसूरत होता है, यह मैंने महसूस किया। रानीखेत में दूसरे दिन हम बिनसर महादेव मंदिर पहुँचे। गिरि संप्रदाय का यह मंदिर पेरूल के जंगल के बीच स्थित है। दुर्गा अष्टमी का दिन ऐसे एक मन्दिर में बिताना सौभाग्य की बात थी। एक ओर मंदिर के वातावरण की शान्ति और दूसरी और पेरूल के जंगल का सौंदर्य जैसे मन में रिस रहा था। 

भारतीय सेना में कुमाऊँ रेजीमेंट के सैनिकों का एक खास स्थान है। दो सौ वर्ष पुराने कुमाऊँ रेजीमेंट के सैनिकों ने हमेशा से युद्ध के समय दिलेरी और साहस का परिचय दिया है। कुमाऊँ रेजीमेंट की देख-रेख में स्थित युद्ध सामग्रियों और तथ्यों से संबंधित संग्रहालय में इसके प्रमाण सुरक्षित हैं। सेना के सेवानिवृत्त कप्तान ने इस संग्रहालय में रखे सामानों से जुड़े इतिहास को बड़ी खूबसूरती से व्याख्यायित किया। उन सामग्रियों को देखते हुए जहाँ एक ओर कुमाऊँ रेजीमेंट के सैनिकों पर गर्व हो रहा था वहीं दूसरी ओर इस बात का भी एहसास हो रहा था कि आजादी से पहले ब्रिटिशों की सेना का अंग बनकर, आजादी के बाद भारतीय सेना का अंग बनकर, युद्ध में शहीद होकर या फिर जीत का सेहरा पहनकर इन सैनिकों ने जीवन में कैसे अनुभव इकट्ठे किए होंगे? उन अनुभवों में दर्द, निर्ममता, अपनों से दूरियों का पूरा का पूरा काफिला होगा। कितना अच्छा होता अगर विश्व के तमाम देश शान्ति या अमन रखने के लिए दोस्ताना रिश्ते रखते और सैनिकों की यह विपुल ऊर्जा देश को उन्नत बनाने के काम में ही खर्च हो पाती। सैनिकों की ऊर्जा का ऐसा प्रयोग मुझे रानीखेत के मनोकामनेश्वरी मन्दिर और गुरुद्वारे में दिखा। 
रात्रिभोज के लिए मिथिलेश और मेनका के घर निमंत्रण था। उनके ही कारण जी.डी. बिड़ला विद्यालय का परिसर देखने का मौका मिला। संथ्या के वक्त उनके घर पहुँचते ही अपनत्व का एहसास हमें घेरने लगा था। उसी विद्यालय की एक शिक्षिका और शिक्षक भी हमारा साथ देने वहाँ मौजूद थे। पुरानी यादों को ताज़ा करने वाली बातों और हँसी ठहाकों के बीच कब संध्या से रात हो गई पता ही नहीं चला। रात्रि भोज को अपनत्व ने और भी स्वादिष्ट बना दिया था। लौटते वक्त परिसर में मौजूद तमाम खास स्थलों से हमारा परिचय करवाते हुए मिथिलेश और मेनका हमें गेस्ट हाउस तक छोड़ने आए। अगले दिन हमें कौसानी के लिए निकलना था। मिथिलेश-मेनका के घर अगले दिन नवमी की कुमारी पूजा थी। पूजा की तमाम व्यस्तताओं के बीच भी मिथिलेश अगले दिन हमारे साथ गॉल्फ क्लब चलने की इ्च्छा जाहिर करके गए।

 रानीखेत के जंगल का सौंदर्य ही अलग था। इस सौंदर्य को और गहराई से महसूस करने मैं अपने परिवार के साथ सुबह की सैर पर निकल पड़ी। जी.डी. बिड़ला विद्यालय के परिसर से दो किलोमीटर की दूरी पर दुर्गा का मंदिर था। मिथिलेश से सुना था कि यहाँ उनका अक्सर जाना होता है। पहाड़ की गोद में पेरूल वृक्षों के वन के बीच बसे मंदिर को देखने की बहुत चाहत थी। सुबह हम इसी मन्दिर की ओर चल पड़े। सर्पीले मोड़ों वाला रास्ता, पेरूल वृक्षों के खूबसूरत जंगल का सौंदर्य और पक्षियों का कलरव एक स्वर्गीय वातावरण तैयार कर रहा था। पहाड़ की गोद में बसे हरड़ा देवी मंदिर (दुर्गा मंदिर) पहुँचते ही पंडित जी ने अपनत्व के साथ भीतर आकर टीका लगाने और प्रसाद लेकर जाने का आग्रह किया। मन्दिर के वातावरण में अद्भुत शांति थी। उसी दिन हमें कौसानी के लिए निकलना था। इसलिए वहाँ थोड़ी देर और रुकने की इच्छा होने के बावजूद भी वहाँ से निकलना पड़ा।रानीखेत से कौसानी जाने का पल हाज़िर था। मिथिलेश भी गॉल्फ क्लब तक हमारा साथ देने के लिए पहुँच चुका था। दूर तक फैले हरे मैदान में बातें करते हुए चलना और छाँव देखकर बैठना एक खूबसूरत अनुभव था। मिथिलेश को अलविदा कहने का समय आ गया था। इस सफर के स्मृति चिह्न के रूप में उसके द्वारा दिए गए पेरूल वृक्ष का फल साथ लेकर हम कालिका देवी मन्दिर की ओर रवाना हुए। बरसों पुराने इस माँ दुर्गा और काली माँ के मन्दिर के वातावरण में अजीब-सी शान्ति थी। यह हजार साल पुराना सिद्ध पीठ है। सिद्ध पीठ अर्थात वह जगह जहाँ किसी ने तपस्या के जरिये सिद्धी हासिल की थी। यहाँ दोनों मंदिर में पुरोहित की भूमिका स्त्रियाँ निभा रही थीं। मंदिर में एक माता जी की भी मूर्ति थी। संभवत: उन्हीं ने इस स्थान पर सिद्धि हासिल की थी। उनकी तपस्या का फल ही मानो हवाओं में घुलकर वातावरण को शान्तिमय बना रहा था। 

कौसानी जाने का सफर शुरू हो चुका था। इस सफर पर कुछ खूबसूरत नजारों ने मन को गहराई से छू लिया। गगस नदी की चंचल धारा और लोद सोमेश्वर की घाटी का सौंदर्य भुलाए नहीं भूला जा सकता था। दोनों ओर पहाड़ से घिरी समतल खेती की जमीन जिस पर धान के फसल की कटाई हो रही थी और पास ही में बहती चंचल पहाड़ी नदी की शोभा ही निराली थी। खूबसूरत नज़ारों का आनंद उठाते हुए हम कौसानी बेस्ट इन आ पहुँचे। इस जगह की पुराने बंगले के लहजे की सजावट और सलीके से लगाए गए पौधों के सौंदर्य ने सबसे पहले हमारा ध्यान खींचा। लेकिन कमरे में पहुँचकर वहाँ से बाहर का नज़ारा देखते ही मानो मन किसी दूसरी दुनिया में ही खो गया। घाटी के समतल में बसे घर और पहाड़ एक साथ दिख रहे थे। समतल पर सुनहरी धूप थी तो पहाड़ों पर मेघ की छाया। ऐसा अद्भुत नज़ारा मैंने पहले कभी नहीं देखा। मन इस गेस्ट हाउस के बरामदे में बैठकर घंटों इस सौंदर्य को निरखना चाहता था। लेकिन समय की कमी का ध्यान रखते हुए सुमित्रानंदन पंत संग्रहालय और अनासक्ति आश्रम के लिए रवाना होना पड़ा।

 भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान से नवाज़े गए हिन्दी के कवि सुमित्रानंदन पंत के जन्म-स्थान पर पहुँचकर मन जैसे वहाँ की प्राकृतिक शोभा में खो ही गया। कौसानी स्थित उनके जन्मस्थान पर आये बगैर इस बात को गहराई से महसूस ही नहीं किया जा सकता कि उनकी रचनाओं में प्रकृति को खास स्थान क्यों मिला। केवल छायावाद के कवि होने के नाते उनकी कविताओं में प्रकृति का महत्वपूर्ण स्थान है, इस बात पर यहाँ आने के बाद विश्वास करना मुश्किल है। इस संग्रहालय की देखरेख का दायित्व उत्तराखंड का संस्कृति विभाग निभा रहा है। संग्रहालय में आने वाले लोगों को काण्डपाल जी बड़े अपनेपन के साथ पंत जी के जीवन से जुड़ी तस्वीरें दिखाते हैं। उन्होंने हमें पंत जी का पुस्तकालय दिखाया। इस पुस्तकालय की खिड़की से पहाड़ों का दृश्य दिखता है। यहाँ आकर महसूस हुआ कि ऐश्वर्यमयी प्रकृति की गोद में पलने बढ़ने वाले इस कवि को प्रकृति से इतना प्रेम क्यों था?

 कौसानी में सन् 1929 में गांधीजी सर्व भारत की यात्रा पर निकलकर विश्राम लेने रुके थे। यहाँ बर्फ से ढँकी त्रिशूल, नंदा देवी और अन्य कई पर्वतों की चोटियाँ देखकर वे मुग्ध हो गए। और यहाँ चौदह दिनों तक रुके। इस जगह को उन्होंनेभारत का स्वीट्जरलैंडकहा। जहाँ गांधीजी रुके थे उसी जगह पर आज अनासक्ति आश्रम है। यहाँ गाँधी जी के जीवन और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका से संबंधित तस्वीरों का संग्रहालय है। इस स्थान से दूधिया सफेद पहाड़ों की चोटियाँ देखते हुए मन नहीं भरता।ऊँची चोटियों वाली बर्फ से ढँकी दूधिया पर्वत श्रृंखला का दृश्य देख पाना सौभाग्य की बात है। जब हम कौसानी पहुँचे तब यह दृश्य मेघों के पीछे कहीं छिपा था। और हम ईश्वर से अगले दिन सुबह इन श्रृंखलाओं को मेघमुक्त कर दने की प्रार्थना कर रहे थे। पता ही नहीं चला कि कैसे समय बीत गया। संध्या होते ही घाटी में स्थित घरों की रोशनी टिमटिमाने लगी। गेस्ट हाउस से यह नजारा ऐसा दिख रहा था मानो जमीन पर तारे टिमटिमा रहे हों। मैं घंटों इसी दृश्य को निहारती रही। रात होने से पहले दूर के पहाड़ों के आसमान पर काले बादल मँडराते हुए दिखे थे। मन में एक आस बँध गई थी कि आज अगर वहाँ जमकर बरसात हो तो कल दूधिया सफेद चोटियाँ दिख सकती हैं। 

जिस सपने को मन में लेकर मैं रात को सोई थी दिन में वह सपना पूरा हो गया। सूरज निकलते ही त्रिशूल, नंदा देवी और अन्य छोटी बड़ी बर्फानी चोटियाँ चमकती हुई दिखाई दी। सूरज की रोशनी से ये चोटियाँ चाँदी की तरह चमक रही थीं। इस अद्भुत दृश्य को मैं घंटों बैठकर देखते रहना चाहती थी। लेकिन वक्त इस बात की इजाजत नहीं दे रहा था। हमें अपने अगले मुकाम मुन्सियारी तक पहुँचना था। यहाँ से लगभग आठ, नौ, घंटों का रास्ता था।

 हम मुन्सियारी के लिए निकल पड़े। लेकिन बर्फ से ढँकी वह पर्वत श्रृंखला दूर तक मानो हमारे साथ चलती रही।पहाड़ी नदी की चंचलता मुझे हमेशा से आकर्षित करती रही हैं। इस सफर में भी गोमती नदी न जाने किस मोड़ से हमारे साथ चलती हुई दिखाई दी। उसी के साथ चलते-चलते हम बैजनाथ मंदिर तक पहुँच गए। गोमती नदी के किनारे बसा यह मंदिर कत्यूरी वंश के शासकों ने बारहवीं सदी में बनाया था। पत्थरों से बना यह मंदिर मानो हमें थोड़ी देर के लिए प्राचीन युग में ले गया। काले पत्थर की मूर्तियों में प्राचीनता का रंग घुला हुआ था। मंदिर की सीढ़ियाँ नीचे झील तक उतर गई थीं। यहाँ भी नैनी झील की तरह ही मछलियाँ राजी खुशी से रहती हैं। यहाँ आने वाले उनको खाना खिलाते हैं। मंदिर के प्रांगण से बर्फीले पहाड़ की चोटियाँ दिख रही थीं। पूरे वातावरण से अद्भुत सौंदर्य टपक रहा था।बैजनाथ मंदिर को पीछे छोड़कर अब हम मुन्सियारी की तरफ बढ़ रहे थे। बैजनाथ में जाकर गोमती और सरयू नदी का संगम नज़र आया। यहाँ से गोमती को पीछे छोड़ते हुए हम सरयू नदी के साथ चल पड़े इस नदी के जल का रंग हल्का हरा है। चपलता के साथ यह नदी हमारे साथ दूर तक चली। मुन्सियारी तक का सफर बहुत लम्बा सफर था। कभी हम किसी पहाड़ के ऊपर चढ़ रहे थे तो कभी दूसरे पहाड़ में जाने के लिए नीचे की ओर आ रहे थे। यूँ ही चलते-चलते मैंने देखा कि अब राम गंगा नदी हमारे साथ चल रही है। इसी सफर में कपकोर्ट पहुँचकर एक चेकपोस्ट से हम गुजरे इस चेकपोस्ट पर वन विभाग का साइन बोर्ड लगा था। यही वह रास्ता था जहाँ से पिंडारी ग्लेशियर की ओर ट्रेकिंग के लिए जाया जाता है। यहाँ खड़े दो व्यक्ति ने हमारी गाड़ी रोककर रेजिस्ट्रेशन करवाने के लिए पैसे माँगे। जब उनसे रेजिस्ट्रेशन करवाने का कारण पूछा गया और यह भी कहा गया कि हम ट्रेकिंग के लिए नहीं जा रहे तब भी वे लम्बे समय तक तर्क करते रहे। उनके पास न वाजिब कागज था और न ही वाजिब तर्क। ट्रेकिंग करने वाले और पर्यटक दोनों ही इस रास्ते से गुजर रहे थे और ड्राइवर के अनुसार कुछ दिनों पहले भी यहाँ रेजिस्ट्रेशन की कोई गुंजाइश नहीं थी। संभवत: रास्ते की खासियत को देखते हुए इस इलाके के उन व्यक्तियों ने आमदनी का रास्ता खोज लिया था। इस घटना के बाद मेरे मन में अचानक ही यह ख्याल आया कि देवभूमि कहे जाने वाले राज्य में यदि ऐसी वारदातें होंगी तो इंसानियत बौनी होती रहेगी। 

मुन्सियारी पहुँचने तक मौसम खराब हो चुका था। आसमान में बादल थे और छिटपुट बारिश हो रही थी। ऐसे मौसम में हम मुन्सियारी में विजय माउन्ट व्यू पहुँचे। यहाँ से बर्फ से ढ़ँकी पंचचूली की चोटियाँ साफ दिखाई देती हैं। लेकिन मौसम खराब होने के कारण बादल हमारे साथ आँख मिचौली खेलते रहे थे। अगले दिन सुबह हम नन्दा देवी मन्दिर गए। हम जानते थे कि पंचचूली की पृष्ठभूमि में यह मंदिर बेहद खूबसूरत दिखता है। लेकिन वहाँ पहुँचकर भी मायूसी ही हाथ लगी। बादलों ने मानो पंचचूली की चोटियों को ढ़ँककर रखने का निश्चय कर रखा था। और प्रकृति के सामने हम बेबस थे। उस दिन रात को जमकर बरसात हुई और सुबह पंचचूली की बर्फ से ढ़ँकी चोटियाँ सूरज की किरणों के पड़ते ही चाँदी की तरह चमकने लगी। उसी दिन हमें मुन्सियारी से कसार देवी के लिए रवाना होना था। रवाना होने से पहले पंचचूली की चोटियों को देखना ईश्वर के दर्शन करने के बराबर था। मैं संतुष्ट थी कि प्रकृति ने हमें मायूस नहीं किया। हम कसार देवी के लिए रवाना हो चुके थे।रास्ते में ही हम मुन्सियारी के कालामुनि टॉप पर उतरे। कालामुनि ने यहाँ साधना की थी। इस जगह से पंचचूली की चोटियाँ साफ दिखाई दे रही थीं। जैसे-जैसे हम कसार देवी की ओर बढ़ते रहे वैसे-वैसे पंचचूली की चोटियाँ पीछे छूटती गईं। 

पहाड़ी गाँव में स्थित कसार देवी मंदिर दो हजार वर्ष पुराना है। यह क्षेत्र पाईन और देवदारू का घर है। यहाँ से हिमालय की बंदरपूछ चोटी दिखाई देती है। सन् 1890 में स्वामी विवेकानन्द को यहाँ गहन आध्यात्मिक अनुभूति हुई थी। अपनी खासियत के कारण यह क्षेत्र कई विदेशियों और भारतीयों को आकर्षित करता रहा है।अल्फ्रेड सोरनसेन (शून्यता बाबा), अर्नस्ट हॉफमैन (जो बाद में लामा गोविन्दा कहलाया) ने यहाँ साधना की। इस इलाके ने हिप्पी आंदोलनकारियों को भी पनाह दी है। माँ आनंदमयी, मनोवैज्ञानिक तिमोथी लियरी, बॉब डायलन, जॉर्ज हैरीसन, कैट स्टीवेन्स, पाश्चात्य बौद्ध राबर्ट थुरमन, लेखक डी.एच. लारेंस ने भी इस क्षेत्र में समय बिताया। कसार देवी मंदिर विशाल भू चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित होने के कारण नासा के वैज्ञानिकों के लिए खास हो उठा है। यह मंदिर बैन एलेन बेल्ट के अंतर्गत आता है। इस, बेल्ट के निर्मित होने के कारणों पर नासा शोध कर रहा है। विश्व में ऐसा उच्च भू चुम्बकीय क्षेत्र पेरू के माचू पिच्चू और इंग्लैण्ड केस्टोन हेन्ज में मिलता है। कसार देवी पहुँचने के साथ ही इस जगह कावैशिष्ट्य हमें आकर्षित करने लगा था। आँखें तो वही पहाड़ और वृक्ष देख रही थीं पर मन न जाने क्यों मंत्रमुग्ध हो गया था। यहाँ हम न्यू डोलमा में ठहरे थे। बौद्ध दम्पति का यह गेस्ट हाउस बड़ी खूबसूरत जगह पर स्थित है। 

आसमान में मेघों का साया था। बर्फ से ढ़ँकी हिमालय की चोटियाँ नहीं दिख रही थीं लेकिन फिर भी मन मायूस नहीं था। एक अजीब-सी शक्ति मानो दिलों को बाँधे हुए थी।न्यू डोलमा गेस्ट हाउस के मालिक से पता चला कि बरसों पहले थोड़ा आगे चलकर पहाड़ के ऊपरी हिस्से में एक ब्रिटिश बंगला हुआ करता था। ब्रिटिशों से हस्तांतरित होते हुए यह एक ऑस्ट्रेलियन परिवार के हाथों में आया। आखिरकार यह परिवार गोविंद लामा के हाथों यह सम्पत्ति सौंपकर चला गया। बंगले से थोड़ा नीचे की ओर बौद्ध परिवार रहते हैं। वहाँ से लगभग 400 मीटर नीचे से कोसी नहीं बहती हैं। उन्हीं से पता चला कि सामने एक बौद्ध मोनास्ट्री भी है। 

अगले दिन कसार देवी मंदिर के साथ ही हमने इन जगहों को भी देखने का निश्चय किया। अगले दिन सुबह होते ही हम कसार देवी मंदिर पहुँचने के लिए चढ़ाई चढ़ने लगे। इस गेस्ट हाउस से मंदिर पास ही था। और चढ़ाई भी थोड़ी-सी ही थी। मंदिर परिसर में कदम रखते ही मन शान्ति से भर गया। यहाँ की हवा में कुछ अलग बात थी। चोटी के करीब पहाड़ की ढलान पर खुला प्रांगण, प्रांगण में बैठने के लिए पक्की जगह और देवी माँ का छोटा-सा मंदिर जहाँ एक गुफा में माता की संगमरमर से बनी मूर्ति है। इस मंदिर से होते हुए सीढ़ियाँ ऊपर की ओर चली गई हैं। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हम शिव मंदिर तक पहुँचे। एक शिलालेख के अनुसार इस शिव मंदिर की स्थापना छठीं शती में दक्षिण भारत बेतिला के पुत्र रुद्र ने की थी। 2000 वर्ष पुराने इस मन्दिर का जिक्र स्कंद पुराण के इस श्लोक में भी मिलता है
कौशिकी शाल्मली मध्ये पुष्य काषाय पर्वत:
तस्य पश्चिम भार्गेव क्षेत्र विष्णो प्रतिष्ठितम॥
मंदिर में अद्भुत शान्ति थी। इस मंदिर के ठीक सामने ध्यान के लिए एक कमरा था ध्यान घर की फर्श मिट्टी से लिपी हुई थी। एक यज्ञ कुण्ड में त्रिशूल गड़ा हुआ था और दिया जल रहा था। छोटे से इस कमरे में ध्यान के लिए आसन बिछे हुए थे। वाकई यहाँ की हवा में घुले अनोखेपन को मैंने वहाँ थोड़ी देर के लिए ही ध्यान में बैठकर अनुभव किया। एक तो वातावरण की अनोखी शान्ति ऊपर से सूरज के साथ मेघों की आँखमिचौली और मेघों का वृक्षों को छूकर बहने की घटना का साक्षी होना एक अनोखा अनुभव था। 
वक्त कैसे बीता पता ही नहीं चला।कसार देवी मंदिर से नीचे उतर कर हम बौद्ध मोनास्ट्री की ओर चल दिए। इसी ओर वह जगह भी थी जहाँ कभी पुराना ब्रिटिश बंगला हुआ करता था। डोलमा गेस्ट हाउस के मालिक ने हमें पुराने ब्रिटिश बंगले की तस्वीर दिखाई थी। उसकी जगह पर आज आधुनिक युग का बड़ा-सा मकान बना हुआ था। पुराना बंगला जंगल के बीच स्थित था। आज वहाँ पक्की सड़क बन चुकी थी। इस जगह के आकर्षण से मन को मुक्त करके मैदानों में लौटने की बात सोचना मुश्किल था। लेकिन इस जगह को अलविदा कहने का वक्त आ गया और मन में इस देवभूमि में दोबारा आने के संकल्प के साथ हम पहाड़ों को पीछे छोड़ते हुए काठगोदाम रेलवे स्टेशन की ओर चल दिए।