नवंबर का महीना समाप्त होने के
कगार पर था। सर्दियाँ मानो दहलीज़ तक पहुँचकर भी कोलकाता में प्रवेश करने से
हिचकिचा रही थीं। हर साल दिसंबर में बड़े दिन की छुट्टियों में मन को प्रकृति की
खुली हवा में रमाने की एक आदत से पड़ चुकी थी। लेकिन इस बार कुछ खास वजह से ऐसा
करना संभव नहीं हो पा रहा था। इसलिए नवंबर के अंत में ही वर्धमान जिले के
यमुनादिघि नामक स्थान पर जाने की योजना बनी। यहाँ राज्य मत्स्य उन्नयन निगम का
आम्रपाली पर्यटन केन्द्र ही एकमात्र रहने की जगह है। इस जगह एक बार पहले भी जाना
हुआ था। लेकिन न जाने क्यों उस वक्त यहाँ का वातावरण मेरे मन की गहराइयों को छू
नहीं पाया था। गेस्ट हाउस का कमरा, समूचे स्थान में झलकती रख-रखाव की कमी और शाम
ढलते ही निगलने वाला अँधेरा मन में ऐसा रिसा कि दोबारा वहाँ जाने का ख्याल भी मन
में नहीं आया। लेकिन शान्तनु की निगाहों ने इस जगह को एक-दूसरे ही पहलू से देखा
था। उसके मन में यहाँ की खुशनुमा छवि कुछ इस तरह रिस गई थी कि उस सफर के बाद वे यहाँ
अपने दोस्त विप्लव के साथ दो-दो बार आकर रह चुके थे। उनके लिए यहाँ आना मन को
तरोताजा करने का एक जरिया बन गया था। सुबह गाँव की सैर, धान के खेत के बीच से बनी
पगडंडियों पर चलना, विशाल धान खेतों के बीच से गुजरी पक्की सड़क पर दूर तक चलना
उनके जिंदगी के कुछ सुनहरे पल के रूप में अंकित हो चुके थे।
शांतनु और मेरी एक बात एकदम एक-सी
है। दोनों ऐसी जगह जाना पसंद करते हैं जहाँ एक जगह पर बैठकर बहुत दूर तक प्रकृति
का खुला प्रांगण दिखाई दे। सुबह सूरज उगने से पहले ही सैर पर निकल जाना और धूप
चढ़ने से पहले गेस्ट हाउस में लौटकर वहाँ के लोगों से उस जगह की संस्कृति के बारे
में जानना और कुछ पढ़ना और धूप की तीव्रता कम होते ही फिर सैर पर निकलकर शाम ढलने
से पहले लौट आना और शाम ढलते ही जम कर अपने अध्ययन कार्य में डूब जाना। हमारे साथ
निकलते-निकलते बेटी राशि को भी यही आदत पड़ गई थी। शहरों से दूर बसे गाँव हमें सबसे
ज्यादा आकर्षित करते थे। यमुनादिघि के बारे में शांतनु के अनुभवों को देखते हुए
मैंने एक और बार वहाँ जाना स्वीकार कर लिया। शान्तनु पिछली बार जिस कमरे में रुके
थे हमें वही कमरा मिले इस बात का उन्होंने खास ढंग से ख्याल रखा। सुबह सात बजे हम
नैहाटी से माँ तारा एक्सप्रेस पकड़ने के उद्देश्य से घर से रवाना हुए।
रेलगाड़ी से गुसकरा स्टेशन पर उतरकर
सड़क मार्ग से सफर शुरू करते ही ग्राम्य जीवन के दृश्यों ने सबसे पहले मेरा ध्यान
खींचा। दोनों ओर फैले धान के खेत, जहाँ फसलों की कटाई हो चुकी थी और बीच से निकली
पक्की सड़क जो टेढ़े-मेढ़े ढंग से बल खाती हुई दूर तक जाती हुई दिखाई दे रही थी। इन
दोनों को एक साथ निरखना एक अनोखा अनुभव था।लगभग साढ़े ग्यारह बजे हम अपने गंतव्य
स्थल यमुनादिघि के आम्रपाली पर्यटन केन्द्र पहुँचे। पर्यटन केंद्र के खुशमिजाज
कर्मचारियों की मेजबानी में अनुभव का एक नया दौर शुरू हुआ।
यमुनादिघि एक बेहद बढ़ा जलाशय था।
राज्य मत्स्य उन्नयन निगम ने इस जलाशय को मत्स्य पालन के लिए मिट्टी की दीवार खड़ी
करके कुल चौबीस हिस्सों में बाँट दिया। हम कच्ची मिट्टी का रास्ता पकड़कर कई
हिस्सों में बँटे यमुनादिघि में पक्षियों का कलरव सुनते हुए और इन पक्षियों की अपने
शिकार को पकड़ने की अद्भुत कला देखते हुए काफी दूर तक निकल आए। आम, नारियल, गुलमोहर
के वृक्षों से भरे इस स्थल में आँखों को खींच कर रखने की अद्भुत ताकत है। जलाशय के
किनारों में कतार में लगे वृक्ष मानो मन को किसी स्वर्गीय लोक में आमंत्रित करते
हुए से जान पड़ते हैं।
ऐड़ाल गाँव के इस यमुनादिघि जलाशय
में कभी गाँव के लोगों का अबाध प्रवेश हुआ करता था। सर्दियों में अनगिनत पक्षी दूर
देश से यहाँ उड़कर आया करते थे। इस बार यहाँ अधिक पक्षी न देखकर मैंने एक स्थानीय
व्यक्ति से इसका कारण पूछा। पता चला कि पक्षी बहुत मछलियाँ खा जाती हैं इसलिए
इन्हें उड़ाने के लिए यहाँ व्यक्तियों को नियुक्त किया गया है। वे बम या पटाखे की
आवाज से इन्हें उड़ाते रहते हैं। वृक्षों का फल और जल की मछली ही इस संपत्ति से
आमदनी के दो महत्वपूर्ण साधन हैं। मछलियों को बचाने के लिए पक्षियों को इस तरह
उड़ाना स्वाभाविक था। लेकिन फिर भी मन को यमुनादिघि का पूरा चित्रपट पक्षियों की
कमी के कारण अधूरा-सा लग रहा था।
सुरक्षा के प्रश्न को ध्यान में
रखते हुए गाँव की ओर जलाशय के किनारे से दीवार उठा दी गई थी और ठीक उसके उल्टी तरफ
जहाँ खेत थे वहाँ लोहे की तार लगाकर जलाशय तक पहुँचने के रास्ते को बंद कर दिया
गया था। चलते-चलते हम जलाशय के उस छोर तक आ चुके थे, जहाँ लोहे के तारों के इस पार
हम थे और उस पार पके सुनहले धान के खेत। कई खेतों में धान की कटाई हो चुकी थी। एक
खेत में एक बड़ी-सी गाड़ी खेत से धान के पौधों को काटकर धान को उन पौधों से अलग कर
दे रही थी। उसी गाड़ी में जोर-जोर से कोई फिल्मी गीत भी बज रहा था। यह दृश्य देखकर
मन में अचानक ही यह ख्याल आया कि बहुत दिनों के बाद नागार्जुन को गाँव में आकर धान
कूटती किशोरियों के जिस कोकिल कंठी तान को सुनने का सुख मिला था आज वह मंजर कहीं
खो गया है। यंत्रों ने मनुष्यों और मनोरंजन के साधनों को किस तरह विस्थापित कर
दिया है। गाँव में पलने-बढ़ने वाली नई पीढ़ी को भी आज धान कूटते हुए गाए जाने वाले
लोकगीतों को सुनने का मौका नहीं मिल रहा। लोकगीतों के इस अनमोल विरासत को हम कहीं
खोते जा रहे हैं। विश्वविद्यालय में लोक संस्कृति, लोकगीतों और लोक तत्वों पर न
जाने कितने शोध-कार्य हुए और होते जा रहे हैं। मगर वो कोशिशें कहीं दिखाई नहीं
देतीजो वर्तमान गाँवों के लोगों के होठों पर लोकगीत को बचाकर रख सके।
अगले दिन सुबह ऐड़ाल गाँव की ओर हम
सैर के लिए सुबह-सुबह निकल पड़े। जलाशय के किनारे बनी दीवार एक जगह टूटी हुई दिखाई
दी। यहाँ से होकर गाँव तक कम समय में पहुँचा जा सकता था। थोड़ी ही देर में हम लाल
मिट्टी के उस कच्चे रास्ते पर आ गए जो ऐड़ाल गाँव की ओर जाता है। यह रास्ता थोड़ा
ऊँचा रास्ता था। नीचे की ओर दूर तक फैले खेत थे। जिन पर गाड़ी से धान की कटाई चल
रही थी। कुछ दूरी पर बड़े-बड़े जंगली पेड़ थे। इस जगह पर खड़े होकर कुछ समय के लिए लगा
कि हम मैदान में नहीं किसी घाटी में खड़े हैं। इस रास्ते पर थोड़ी देर तक चलने के
बाद ही कच्ची मिट्टी से बने घर दिखाई देने लगे। घरों के सामने बड़े-बड़े आंगन थे
जहाँ धान को फैलाकर रखा गया था। धान के सूखे पौधों से ही धान रखने के लिए एक विशाल
घर-सा बना हुआ था। धान रखने की यह जगह भी लोक शिल्प का एक खास उदाहरण कहा जा सकता
है। गाँव वालों से ही पता चला कि धान को गाँव वाले इसके सूखे पौधों से बने आधार
में तब तक रखते हैं जब तक इसके अच्छे दाम न मिले। धान, मुर्गियों और बत्तखों के
अंडे, गाय और बकरी का दूध इस गाँव के लोगों के आजीविका कमाने के साधन हैं। गाँव
में कई बड़े-बड़े पक्के मकान भी दिखे। साथ ही एक मस्जिद भी बनती हुई दिखी।
पिछली बार जब शान्तनु अपने दोस्त
के साथ इस गाँव में आए थे तब एक व्यक्ति से भेंट हुई थी जिसका बेटा आई.आई.टी. का
छात्र था। और एक व्यक्ति भी मिला था जिसका बेटा बैंगलोर में कार्यरत था। इस बात से
यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि गाँव
की नई पीढ़ी निश्चित रूप से शहरों की ओर भाग रही है। यदि कृषि क्षेत्र में अनुसंधान
के जरिए बीज बोने से लेकर फसल काटने तक की पद्धति को अधिक से अधिक वैज्ञानिक और
सुविधाजनक बनाया जाता तो किसान के बेटे कृषि कार्य को ही अत्याधुनिक साधनों के
सहारे अधिक चाव लेकर करते। मैंने यह बेहद गहराई से महसूस किया कि कृषि प्रधान देश
होने के नाते यह बहुत जरूरी है कि भारत में ऐसे हालात पैदा हों कि किसान का बेटा
कृषि कार्य में ही अपने उज्जवल भविष्य का सपना देख सके।
गाँव में भी बड़े-बड़े तालाब दिखे।
इन तालाबों में पक्षियों का दल जम कर अठखेलियाँ कर रहा था। यहाँ उन्हें रोकने
टोकने वाला कोई नहीं था। सर्द मौसम की खिली हुई धूप थी और ऐसे में हल्की-हल्की
शीतल हवा के बीच तालाबों में उमड़ते पक्षियों का खेल देखने का मजा ही खास था। तालाब
के बगल में सोनाझुड़ी वृक्षों के वन में खड़े होकर हम एकटक तालाब और पक्षियों को देख
रहे थे। प्रकृति का अपार वैभव मानो मन मस्तिष्क में आनंद का झरना बनकर बह रहा था।
यमुनादिघि में तीसरे दिन सुबह हमने धान खेत के बीच से निकली पक्की सड़क पर दूर तक
चलने का निश्चय किया। दूर तक फैली सुनहरी धानी जमीन और सिर के ऊपर नीला आसमान और
उन दोनों के बीच दूर विभाजक की तरह खड़े हरे पेड़ों की श्रृंखला के बीच हम अपने आपको
सृष्टि के कैनवास के अंग-सा महसूस कर रहे थे। नीचे जितनी दूर तक नजर जा रही थी
सुनहरे रंग का विस्तार था और ऊपर आसमान की विशाल नीली चादर। राह चलते हुए एक ऐसे
व्यक्ति से भेंट हुई जो फसल काटने के लिए गाड़ी भाड़े पर देने का कार्य करता है। उसी
ने हमें बताया कि धान का पौधा जब गाड़ी के कटर के जरिए काटा जाता है तब उसी के भीतर
बने एक खाने में धान जमा हो जाता है और पौधे का कटा हुआ हिस्सा बाहर निकल आता है।
इस गाड़ी के चालक अक्सर पंजाब से आते हैं। जो एक महीना कार्य करने के लिए चालीस
हजार लेते हैं। इंटरनेट के जरिए न्यूनतम दस हजार रुपये भेजकर उनसे कार्य करने की
जबानबंदी ली जाती है। चालक के तीन वक्त का खाना-पीना और गाड़ी में संगीत की
व्यवस्था तो आम बात है। धान की कटाई का काम आसान करने बाजार के रास्ते से आई
आधुनिक गाड़ी अपने साथ फिल्मी संगीत की भी संस्कृति लेकर घुस आई। काश कि काम आसान
करने वाली गाड़ी के साथ लोकगीत के कोमल तंतुओं का मेलबंधन हो जाता और गाँवों में
धान कटाई का मौसम एक उत्सव की शक्ल ले पाता। इस सपने और आज की हकीकत के बीच की खाई
को महसूस करके मुझे विश्वविद्यालयों में लोक संस्कृति पर होने वाले तमाम शोध कार्य
अधूरे से लगने लगे। रह-रह कर मुक्तिबोध की यह बात याद आने लगी कि ज्ञान के दाँत
जिंदगी की नाशपाती में गढ़ने चाहिए ताकि संपूर्ण आत्मा जीवन का रसास्वाद कर सके।
धरती का सुनहरा धानी चादर देखने के
बाद मन में हरे परिधान में इसी धरती को देखने की ख्वाइश परवान चढ़ने लगी थी। इसी
ख्वाइश ने हमें स्थानीय लोगों से यह पूछने को मजबूर किया कि किस महीने में यहाँ
आने पर खेतों की हरियाली देखी जा सकती है। पता चला कि दुर्गा पूजा के दौरान इन
खेतों में लहलहाती हरी धान की फसल देखी जा सकती है। अगर खेतों में कैनल के जरिए
सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाए तो माघ के महीने में भी हरी फसल दिख सकती है। इस
महीने के धान की खेती को यहाँ ‘बोरो चाश’ कहते हैं। धान की यह फसल पूरी तरह
से कृत्रिम सिंचाई की व्यवस्था पर निर्भर करती है। सीमित जल के कारण जिन ग्रामों
को ‘बोरो चाश’ के लिए जल नहीं मिल पाता उन ग्रामों की जमीन साल भर
के लिए बेकार ही पड़ी रहती है। यमुनादिघि के गेस्ट हाउस के कमरे के बरामदे से दूर
तक हमें जो खेत फैले दिखाई दे रहे थे उन खेतों को अगर बोरो फसल के लिए कैनलों के
जरिए सिंचाई का जल न मिले तो वह साल भर खाली ही पड़े रहते हैं। यहाँ काम करने वाली
एक महिला ने बताया कि अगर कैनल से पानी न मिले तो माघ के महीने में हरे चादर ओढ़े
हुए खेत देखने आने की ख्वाइश पूरी न हो सकेगी। इस बात को सुनकर मन ख्वाइशों की गली
से बाहर निकलकर एक ऐसी गली में जाकर दाखिल हुआ जहाँ मन में रह-रह कर यह सवाल उठने
लगा कि दो-तीन महीनों में ही उन्नत फसल देने की क्षमता रखने वाले बीज आज उपलब्ध
होने के बावजूद सिंचाई के लिए आवश्यक जल की अनुपलब्धता मिट्टी से सोना उगाने की
राह में बाधक बनकर खड़ी हो रही है। खेतों तक जल पहुँचाने वाले कैनलों का बाँधों से
संबंध बाँधों से कितना पानी किस राज्य को मिलेगा या नदी से कितना पानी किस देश को
मिलेगा कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर किसानों का भाग्य निर्भर करता है। मन ने पहली
बार यह महसूस किया कि अन्न उगाने वाले हमारे हकीकत के अन्नदाता किसानों के हाथ किस
कदर बँधे हुए हैं। मेरे साथ बेटी राशि भी इस बात को समझ पा रही थी कि जो चावल मूल्य
देकर बाजार से आसानी से मिल जाता है उसके साथ किसानों की जी-तोड़ मेहनत और जिजीविषा
दोनों का गहरा संबंध है।
किसानों के जीवन को यहाँ आकर गहराई
से देखने का मौका मिला। खून पसीना एक करके धान उगाने वाले किसान की मजबूरी भी साफ
दिखाई पड़ी। ‘राइस मिल’ पर सरकार का अख्तियार न होना और इसलिए कम दामों में
ही किसानों के धान को बेच देने की मजबूरी उनको धान का वाजिब दाम नहीं दिलवा पा
रही। आलू की खेती करने वाले किसानों के साथ भी यही समस्या है। सरकारी ठंड़े गोदामों
की कमी के कारण किसानों को या तो वाजिब दाम न मिलने तक आलू को सुरक्षित रखने के
लिए ठंडे गोदामों के मालिक को भाड़ा देना पड़ता है या फिर कम दामों में इसे बेच देना
पड़ता है। मन में अनायास ही यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि कॉमर्स क्षेत्र में शोधकार्य
करने वाले विद्यार्थी अगर ऐसे व्यावहारिक समस्याओं के समाधान खोजने के लिए
शोधकार्य करते तो शिक्षा पर सरकार द्वारा किया जाने वाला विपुल व्यय सार्थक हो
पाता।
प्रकृति की गलियों में घूमते हुए
मन मानो कुछ समय के लिए व्यावहारिक समस्याओं के घने जंगल में फँस गया था। आम्रपाली
पर्यटन केन्द्र के जलाशय में नौकाविहार मन को फिर से प्रकृति के साये में ले आया,
प्लास्टिक के पैडल बोट पर चढ़कर नौकाविहार एक यादागार मंजर बनकर रह गया। आम,
नारियल, गुलमोहर के वृक्षों से घिरे जलाशय में नौका विहार करते हुए किनारे बैठे
कुछ सफेद पंछियों को देखना एक खूबसूरत अहसास था। जलाशय के किनारे लगे गुलमोहर के
पेड़ों पर जब फूल खिले हों तब यही नौकाविहार कितना मनोरम होगा यह महसूस करके मन में
गुलमोहर के फूलों से लदे पेड़ और लहलहाते हरे खेत दिखाई देने की ऋतु में यहाँ आने
की इच्छा मानो जमकर बैठ गई।
दोपहर को भेल्की नामक गाँव में साल
वृक्षों के वन के बीच बसे स्थान भेल्की मचान में जाने की योजना पहले से बनी हुई
थी। साल वृक्षों के वन और सोनाझुरी वृक्षों के वन के बीच से पक्की सड़क बल खाती हुई
भेल्की मचान की ओर चली गई थी। रास्ते में सदियों पहले भेल्की के जमींदारों द्वारा
बनाई गई इमारतों के ध्वंसावशेष भी दिखाई पड़े। वन के बीच जलाशय भी थे। रख-रखाव की
कमी, तालाब के अपरिष्कृत जल और उस जल में रखे दो टूटे-फूटे नावों को देखकर मन
भेल्की मचान में रम नहीं पाया। थोड़े ही समय में हम बाहर निकलकर साल वृक्ष के वन के
बीच से गुजरी पक्की सड़क की निर्जनता को महसूस करके तृप्त होने लगे। भेल्की मचान के
पास ही पुराने ईंटों से बना एक लम्बा ढाँचा दिखा। ड्राइवर ने बताया यह कभी
जमींदारों का ‘वाच टावर’ हुआ करता था। फिर नक्सलों के ज़माने में इसके नीचे
सुरंग खोदा गया। उस सुरंग को अब लोहे के गेट से बंद कर दिया गया है।
धानी जमीन के इस सौंदर्य को छोड़कर
शहर लौटने का दिन हाजिर था। हम सुबह की सैर पर निकलकर यमुनादिघि के आखिरी छोर तक
गए। लोहे के तारों को पार करके हम खेत की ओर आ गए थे। खेत और यमुनादिघि जलाशय के
बीच बने टेढ़े-मेढ़े कच्चे रास्ते पर चलते हुए सुबह की हल्की धूप और ताज़ी हवा जैसे
जेहन में रिस रही थी। दूर के कुछ खेतों में लोग धान के सूखे पौधों का गट्ठर बाँध
कर गाड़ी में रख रहे थे। एक खेत में धान की कटाई के लिए गाड़ी खड़ी दिखाई दी। दूर से
एक व्यक्ति बैलगाड़ी लेकर जाता हुआ दिखा। उधर हमारे दाहिने तरफ पानी में बत्तखें
तैर रही थीं और सफेद, भूरे रंग के पक्षी अपनी लम्बी गर्दन तानकर जलाशय के किनारे
शिकार की टोह में बैठे थे। जलाशय और खेतों के बीच विभाजक रेखा-सी बनकर गुलमोहर के
पेड़ कतार में खड़े थे। मन में इस दृश्य की ऐसी तस्वीर खिंची जिसे शब्दों में बयान
करना कठिन है। इसी तरह चलते हुए जब घास पर जमें ओस कण पर नजर पड़ी तब कविगुरु
रवीन्द्रनाथ की वह पंक्तियाँ अनायास ही याद आई जिनमें यह भाव व्यक्त था कि मैं
नदी, पर्वत सागर देखने कितनी दूर-दूर तक गया लेकिन घास पर जमे ओस के एक कण के सौंदर्य को कभी देख ही नहीं पाया।

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